शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

सूर्पनखा का वध क्यों नहीं,केवल नाक कान ही क्यों काटा गया?

मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर जो कुछ धब्बे हैं उनमें एक नारी के नाक कान काटने वाला प्रसंग भी है ? क्या नारी के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम का यह आचरण उचित था .? वे सर्वशक्तिमान थे,फिर भी उन्हें ऐसे स्तर तक उतरना पडा ? विचारकों ने इस प्रश्न पर समय समय पर बहुत सोचा बिचारा है -आईये उनकी बातों से आपसे साझा करें .

सूर्पनखा ने भेष बदला ,अपने को सर्वांग सुन्दर रूप में राम के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया -कहा कि तुम्हारे सरीखा पुरुष और मेरी जैसी सुन्दर नारी की जोड़ी अच्छी रहेगी ....अब राम के सामने स्वांग ? पर राम की सौम्यता देखिये ,उन्होंने मुस्कुराते हुए यही कहा कि देखो मैं तो शादी शुदा हूँ तुम अपने योग्य कोई और वर ढूंढ लो -फिर उनके मन में भी थोड़ी चुहल /मौज मस्ती समाई (नर लीला हम आप जैसी ) कहा मेरा भाई कुंवारा है उससे पूछ लो ...अगर वह चाहे तो उससे विवाह कर सकती हो -वह लक्षमण  के पास चली गयी -लक्षमण पर सेवा भाव हावी था -बोले मैं तुमसे विवाह करूं या प्रभु चरणों में विनयावत रहूँ ....मुझे फुरसत कहाँ तुमसे आमोद प्रमोद का ..प्रभु सर्व समर्थ है वही तुम्हे सदगति देगें ...काम पिपासु सूर्पनखा अब राम और लक्ष्मण के बीच शटल काक बनी रही .....

यहाँ तक की लीला   तो ठीक थी .... मगर अचानक उसने एक अनहोनी कर दी -उसने सोचा सीता को ही खत्म कर दूं तो बात बन जाय -वह भयानक बनी सीता की ओर झपटी ....और फिर अपने धर्म से च्युत न होने वाले राम ने उसे सांकेतिक दंड देने का इशारा लक्ष्मण को किया - -लक्ष्मण ने नाक कान काट कर उसे अपमानित कर दिया -उसकी नाक कट गयी -माने अपमानित हो गयी .मगर उसे अब भी चैन नहीं था ....वह और भी भयंकर प्रतिशोध के लिए रावण के पास पहुँच कर अनाप शनाप बकने लगी -प्रलाप करने लगी -झूंठ सत्य नमक मिर्च मिला रावण को भड़काने लगी -उसने रावण को एक आमंत्रण  भी दिया =राम की पत्नी बहुत खूबसूरत हैं ...वह रावण की रुचियों को समझती थी -बहन जो थी ...और फिर सीता का हरण युद्ध  की पूर्व पीठिका रच गया ..

राम के पास कोई विकल्प नहीं था  बन्दर तक के चित्रों से भय खाने वाली सीता एक राक्षिसी का रौद्र रूप देख वैसे ही अधमरी हो रही थीं -और राम सीता की मृत्यु  तटस्थ होकर कैसे देख सकते थे -लिहाजा कोई विकल्प नहीं था सिवाय सूर्पनखा को दण्डित करने का ....वे उसका वध भी कर सकते थे ..ताड़का का वध किया ही था  ...लेकिन   बस नाक कान काट के छोड़ दिया ...मानो भविष्य की सूर्प नखाओं को सन्देश देना चाहते हों -पर पुरुष के पास आमंत्रण लेकर मत जाओ -नारी पर प्रहार मत करो ...
अन्यथा तुम्हारा भी नाक कान काटना तय है -अपमान तय है ....

अफ़सोस है लोग फिर भी इतिहास पुराण से शिक्षा नहीं लेते ...
.
जय श्रीराम ....

42 टिप्‍पणियां:

  1. इसीलिए नाक काटी गई थी की उसे सदा अपनी गलतियों का अहसास रहें ... सुन्दर प्रसंग प्रस्तुति ..आभार

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  2. एक गुप्त सन्देश ये भी हो सकता है की मनुष्य को सुन्दरता परखने में जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिए , make up में जो कटरीना कैफ लग रही है, उसका make up विहीन चेहरा सूर्पनखा सा भी निकल सकता है !

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  3. पापी को सजा देना तो अधर्म नहीं है ।
    राम ने भी यही किया ।
    लेकिन आजकल तो पुरुषों में भी कहाँ मर्यादा बची है ।

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  4. पोस्ट और डा0 साहब की टिप्पणी अधरों पर सहज मुस्कान ला देती है।

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  5. नरेन्द्र कोहली ने इस प्रकरण को बहुत ही 'वैज्ञानिक' ढंग से प्रस्तुत किया है।

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  6. बाकी प्रसंग तो ठीक है ....

    -फिर उनके मन में भी थोड़ी चुहल /मौज मस्ती समाई (नर लीला हम आप जैसी ) कहा मेरा भाई कुंवारा है उससे पूछ लो ...अगर वह चाहे तो उससे विवाह कर सकती हो -वह लक्षमण के पास चली गयी -

    लेकिन क्या यहाँ राम ने झूठ नहीं बोला ? ...लक्ष्मण तो शादीशुदा थे ...

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    1. सीता चितहि कहइ सुनु बाता ,अहै कुआर मोर लघु भ्राता ।

      जैसा आप सभी जानते है कि तुलसीकृत रामायण के आलावा भी कई और रामायण है जिनमे कई प्रसंगो में भिन्नताएं है

      आप सभी जानते है कि लेखक ही पात्र का चरित्र चित्रण करता है इसलिए राम को झूठ बोलने का दोषी कहना अनुचित है तुलसी जी ने जो चित्रण किया है वो बाल्मीकि कृत रामायण से बहुत भिन्न है


      फिर भी मैं ये कहना चाहूँगा की तुलसी कृत रामायण की चौपाई के शब्दों के पर्यायवाची का अनुसरण करे तो भावार्थ कुछ इस प्रकार भी निकलता है
      1-राम ने झूठ नहीं बोला बल्कि ये कहा कि मेरी पत्नी मेरे साथ होने के कारन मेरे जीवन में पूर्णता है परंतु यहां वन में मेरा छोटा भाई बिना पत्नी के होने कारन कुँवारा जीवन व्यतीत कर रहा है जिस कारन वह क्वारे है
      अतः आप अपना वैवाहिक प्रस्ताव मेरे छोटे भाई को दे सकती है ।


      विशेष- एक से अधिक विवाह पर प्रतिबन्ध नहीं था

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  7. @संगीता जी पड़े पते की बात आपने पकड़ी ..
    कहा न राम के मन में थोड़ी चुहल /मौज लेने की आयी ...
    फिर स्वांग किये हुए से क्या सच क्या झूठ ...जिसका असली चेहरा ही कुछ और हो !

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  8. संगीता दी के जैसा ही विचार मेरे मन में भी आया ....यहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम ने सत्य क्यों नहीं कहा ?

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  9. आज की पोस्ट समसामयिक प्रसंगों से उपजी हुई लगती है ! इसलिये अपना वोट 'मजाल' के गुप्त सन्देश के साथ :)

    उस टिप्पणी में हमारी ओर से ये भी जोडें कि सौन्दर्य में विचार भी शामिल हैं !

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  10. तभी तो राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। पर आजकल ऐसे पुरुष मिलना मुश्किल और सूर्पनखा मिलना बहुत आसान हैं, जो कि आसानी से किसी को भी भिड़ा दें।

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  11. ओह ताला लगा है, आज ध्यान दिया....

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  12. ....वे उसका वध भी कर सकते थे .....लेकिन बस नाक कान काट के छोड़ दिया ...मानो भविष्य की सूर्प नखाओं को सन्देश देना चाहते हों -पर पुरुष के पास आमंत्रण लेकर मत जाओ -नारी पर प्रहार मत करो ...
    अन्यथा तुम्हारा भी नाक कान काटना तय है -अपमान तय है ....

    बहुत अच्छी व्याख्या.

    आभार.

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  13. इस टिप्पणी को मर्डरेट करना हो तो भले कर दें, पर मुझे रावण के चरित्र को दागदार ठहराना अनुचित लगता है । वह व्यभिचारी या बलात्कारी होता तो ( बज़रिये वाल्मिकी रामायण ही सही ) तुलसीदास जी इतना बड़ा टँटा खड़ा न कर पाते । यदि रामकथा को केवल प्रभुलीला के पक्ष से ही परखा जाये, तो वह राम को महिमामँडित करने के प्रयोजन से इस कथा में शिव का कृपापात्र चरित्र था ।
    सदियों से चले आ रहे शैव-सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदायों के मध्य खूनी सँघर्ष का उन दिनों तक भी एक अनिर्णीत विराम चल रहा था । रावण तो शिव की सहमति ( वरदान ) से राम को तारणहार होने का श्रेय देने का हेत मात्र है । सो, सूपनखा को राम के हाथों सद्गति पाने की प्राथमिकता मिलने का सवाल ही नहीं था । प्रतीकात्मक रूप से राम में मेरी पूर्ण आस्था होते हुये भी मैं रामकथा में वर्णित सँदर्भों को दोनों सम्प्रदायों के मध्य सह-अस्तित्व के एक सँधि-प्रस्ताव के रूप में देख पाता हूँ ।

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  14. ऍप्रूवल वास्ते पत्रम-पुष्पम स्वरूप
    इस पोस्ट को विचारोत्तेजक पोस्ट का खिताब दिया जा सकता है !

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  15. बड़ा ही सामयिक चित्रांकन खीचा है आपने , विस्मित हुआ यह जान कर नारी सौंदर्य के प्रति संवेदनशील लेखक को अचानक शूपर्णखा की याद कैसे आने लगी वैसे लंका में शूपर्णखा भी एक सुन्दरी थी उसके पति की हत्या शंका के कारण खुद रावण ने कराई थी चूंकि वह युवा काल में ही विधवा हो गई थी इस लिए उसकी आह अन्य स्त्रियों पर न पड़े इसी लिए उसे सीमांत प्रदेश में रावण ने बसाया था किन्तु यहाँ यह प्रसंग हो गया एक कामोन्मत्त विधवा अचानक सुन्दर राम को देख कर प्रणय निवेदन करती है जिसकी यह दुखद अंत हुआ
    खैर जो अतीत में हुआ उसकी पुनरावृत्ति बाद में नही हुई अब तो चाहे सूपर्णखा हो या त्रिजटा सभी को लोग बड़े प्रेम से गले लगा रहे है स्त्री की गलती को बड़े लोग माफ़ कर देते है
    आप को भी इसी उदात्त भाव से प्रसंग को लेना चाहिए अरे राम को तो लीला करनी थी अब चाहे उसे उद्धार की संज्ञा ही क्यों ना दी जाय
    ब्लॉग जगत में आपको राम के इस आचरण के अनुरूप कार्य करने की अनुमति नही दी जानी चाहिए

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  16. राम ने झूठ क्यूँ बोला ....अपना निशाना लक्ष्मण की ओर क्यूँ किया ....!
    आखिर सीता के दुर्भाग्य का कारण भी तो यही हुआ !

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  17. @ मिश्र जी
    आर यु श्योर राम ने कहा "कुंवारा" है , न की "फिलहाल अकेला" है

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  18. वाणी जी ,
    कपटी ,स्वांग धरे राक्षसी के सामने कैसा झूंठ -वे तो तत्क्षण उसकी असलियत पहचान गए थे ..मगर लीला पुरुष थे ..थोडा लीला भी कर लिए ....राक्षसी ने उनके साथ माया की ,छल किया -राम तो ठहरे भोले भाले -बनावट नहीं दुराव नहीं छिपाव नहीं ..राम नहीं चाते थे उसे दण्डित किया जाय ..कुरूपा ने उन्हें विवश कर दिया ,पूरा ड्रामा कर डाला -राम ने साम दाम दंड भेद का सहरा लिया -पहले कहा विवाहित हूँ -कुलटा नहीं मानी ,फिर भेद का सहारा लिया ..लक्ष्मण कुंआरे हैं ..कामवासना की पूर्ति होती न देख सूर्पनखा क्रोध से पागल हो उठी -अब वह आततायी बन बैठी थी -जिनके वध में कोई दोष नहीं -पर फिर भी उदार राम ने उसका केवल नक् कान काटने का आदेश दिया ...(प्रेम याचना से थोडा तो स्नेह भी उपजा ही होगा :) ) सहसा कोई स्त्री सरस प्रस्ताव रखे तो उससे रुखाई से पेश भी तो नहीं हुआ जाता -राम ने झूंठ नहीं बोला थोड़ी हंसी की ,ठिठोली की -थोड़ा तो उनमें मानव स्वभाव को स्वीकार कीजिये ....वे दुर्घटना को विलम्बित करते जा रहे थे ..पर होनी तो बलवान है ..होके रही .....

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  19. आधुनिक राम होते तो कूटनीति से काम लेते और रावण जैसे अति पराक्रमी को साला बना लेते.

    कोई अनहोनी तो न होती
    आखिर दशरथ के चार रानियाँ थीं

    [आपने जबरिया रावण के चरित्र हनन का प्रयास किया है. एक स्वाभिमानी भाई होने के नाते रावण को जो उचित लगा वो उसने किया. किसी नारी द्वारा प्रेम निवेदन कोई ऐसा अपराध नहीं कि उसका किसी भी प्रकार उपहास बनाया जाए और ऐसी सजा दी जाए कि वो जिंदगी भर किसी को अपना मुंह न दिखा पाए. सीता जी को शूपर्णखा द्वारा ख़त्म करने की बात भी जबरिया जोड़ी गयी लगती है, वो भी सिर्फ इसलिए ताकि प्रभु राम के कृत्य को सही ठहराया जा सके.]

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  20. गौरव
    राम ने कहा
    अहहि कुमार मोर लघु भ्राता
    मगर गौरव रामायण (अगर लिखी जाय ) में अकेला कहायियेगा .... :)

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  21. प्रकाश जी ,
    पूरे कमेन्ट पढने के बाद एक बार फिर कुछ कहें:)

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  22. @...वे दुर्घटना को विलम्बित करते जा रहे थे....

    हाँ......इस घटना के साइकोलोजिकल आस्पेक्ट भी देखे जाने चाहिए, हम अक्सर शब्दों में ही उलझ जाते हैं :)

    वाणी जी को दिया गया स्पष्टीकरण बढ़िया लगा,
    ज्ञान प्राप्त हुआ , आभार :)

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  23. प्रेम निवेदन को ठुकरा दिया जाना क्रोध का कारण बना। क्रोध के निष्कर्ष तो कभी स्वस्थ नहीं रहे हैं और न ही कभी प्रेम इस भाव से दूषित ही हो पायेगा।

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  24. हाहाहाहाह बहुत खूब मिश्रा जी क्या लिखा है आपने, एक दम सही । अब देखिए ना ये प्रसंग तो बहुत पुराना हो गया परन्तु इसके किरदार अब भी यदा कदा दिखते रहते है जो कि तठस्थ होकर मौके की तलास मे रहते है कलाकारी दिखाने के लिए । बात आपने सही कहा कि लोग पढते तो जरुर है लेकिन अमल नहीं लाते नहीं तो वक्त बे वक्त ऐसा प्रकरण सामने न आता ।

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  25. भांति भांति के कमेंट देखकर लगता नहीं है कि लोगों द्वारा इस 'सूपर्नखा पोस्ट' का आशय समझा गया है.....या फिर जान कर भी शायद लोग अंजान बने रहना चाहते हैं ।

    दो-तीन कमेंट जरूर इस समसामयिक पोस्ट की मूल भावना की ओर इशारा करते लग रहे हैं :)

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  26. अरविंद भाई जब तक हम राम को मर्यादा पुरुषोत्तम, लीलापुरुष, महामानव की तरह देखते रहेंगे, सवाल उठते ही रहेंगे. आज के समय में राम के मिथक के भी पुनर्पाठ की जरूरत है. आप एक ऐसे सामाजिक नेता के रूप में उन्हें देखिये जो एक श्रेष्ठ मनुष्य है, पर मनुष्येतर नहीं है. तब कोई सवाल नहीं उठेगा और तब राम से सीखने में भी लोगों को आसानी होगी. हमें पूजा जाने वाला राम नहीं चाहिये, हमें एक मित्र, एक भाई की तरह राम चाहिये, जो हमारे काम आ सके. इस नाते वाल्मीकि, कम्बन और तुलसी के राम से मुक्त होकर हमें अपना राम खड़ा करना होगा.

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  27. अगर पूरे मामले को वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए, तो सूर्पणखा अपने जींस से प्रताणित लगती है। यही कारण था कि जब अंदर से भावनाओं ने उबाल मारा, तो बेचारी अपने पर कंट्रोल नहीं कर पाई। वैसे इतना तो तय है कि समय बीतने के साथ ही साथ यह जींस और शक्तिशाल होता गया है। यही कारण है इस कथा के इतने प्रचलन में होने के बावजूद लोग अपने पर कंट्रोल नहीं कर पाते।:)

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  28. आधुनिक सूर्पणखाओं, क्या तुम इससे सीख लोगी?

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  29. हालाँकि इस समसामयिक पोस्ट की मूल भावना को हम बखूबी समझ रहे हैं...लेकिन उसे दरकिनार कर हम रामायण प्रसंग पर ही बात करते हैं....
    जैसा कि ऊपर की कईं टिप्पणियों में ये बात कही गई कि मर्यादा पुरूषोतम होकर राम नें असत्य का आश्रय क्यों लिया...ये ठीक है कि राम सर्व-सदगुण-सम्पन्न आदर्श पुरूषोतम थे, फिर वे मूलत "नर" "मानव" थे. अत: यह बिल्कुल अस्वभाविक नहीं हैं कि उनमें मानवीय विकार आदि के कारण कईं बार दुर्बलता उत्पन हुई हों. यदि ऎसी मानवीय दुर्बलताएं उनमें न पाई जातीं तो वें विशुद्ध सदगुणों की मूर्ती बन जाते----तब उनका चरित्र निर्जीव जान पडता, उतना हमारे निकट न पहुँच पाता, जितना आज वह जान पडता है. आज राम श्रेष्ठ सही, फिर भी हम आपमें से एक जान पडते हैं. वाल्मिकी के राम तो वास्तव में "नर" ही थे..इसलिए पूरी की पूरी रामायण में उन्होने कहीं भी ( जैसा तुलसीदास जी रामचरितमानस में कह गए हैं) ये नहीं कहा कि राम "नर-लीला" कर रहें हैं. सो, इस प्रकार की मानवीय दुर्बलताएं तो उनकी जीवन संगिनी बन अंत तक बनी रही...ओर इसमें अस्वभाविकता भी कहाँ हैं....

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  30. सतीश मिश्रा4 सितंबर 2010 को 3:04 pm

    हे कलियुगी सूर्पणखाओं, चेत जाओ, वर्ना नाक कान से हाथ धो बैठोगी।

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  31. यह तो मानस का प्रसंग है. अब मैंने तो परसाई जी को पढ़ा है तो इस बारे में टिपण्णी करना मुश्किल है. आखिर हलके-फुल्के मन पर चिरस्थाई प्रभाव की बात जो है...:-)

    उत्तर देंहटाएं
  32. .
    .
    .
    क्या कहें,

    प्रभु की लीला प्रभु ही जानें...और शूर्पणखा की लीला भी प्रभु ही जानें...

    हम तो चुप ही रहेंगे...कौनो हमारे आज कुछ कहने से कुछ बदल जायेगा ?


    ...

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  33. सुन्दर प्रसंग। मगर कनू जी से कहना चाहूँगी कि अगर आधुनिक सरूपनखायें सन्यास ले लेंगे तो फिर रावणो का संहार कैसे होगा? अज एक नही बल्कि हर गली चौराहे पर रावन हैं। शायद सरूपणखाओं ने सोच लिया है कि उन्हें उनके तीर से ही मारो . अब वो राम लक्षमण को कष्ट नही देती । वैसे भी राम लखन रहे कहाँ हैं। सबक लेने की आदत तो इन्सान को कभी नही रही। धन्यवाद इस सुन्दर प्रसंग के लिये।

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  34. एक प्रसंग कितना महत्वपूर्ण था, आज इसकी एक बानगी दिखी यहाँ.
    बढ़िया प्रस्तुति और टिप्पणियों से ज्ञानवर्धन भी हुआ!!

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  35. मुझे नहीं पता कि जिन आधुनिक शूर्पनखाओं को इंगित करते हुए आपने यह पोस्ट लिखी हैं उन्होंने इसे पढ़ा या नहीं लेकिन समझ में आ रहा है आप जो कहना चाहते हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  36. आप सभी विध्वानो को मेरा (मयंक शर्मा)का नमश्कार आप सभी से एक बात जानना चाहता हु की रामायण में प्रमुख खलनायिकाओ में से एक सुपर्णखा की जानकारी मुझे सही से कोई नही दे पाता ।क्या आप में से कोई इस बात की जानकारी रखता है की राम और रावण के युद्ध के बाद सुपर्णखा का क्या हुआ वो कहा गई उसकी शादी किस्से हुई क्या उसके कोई सन्तान हुई या नही आखिर इतनी बड़ी खलनायिका गायब कहा हो गई अगर आपमें से कोई सुपर्णखा का इतिहास जानता है तो क्रप्या बताय
    धन्यवाद
    आप मेरी इस बात को मज़ाक नही समझे मुझे सच में इस बात को जान्ने की इच्छा है की क्या हुआ सुपर्णखा का

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  37. आप सभी विध्वानो को मेरा (मयंक शर्मा)का नमश्कार आप सभी से एक बात जानना चाहता हु की रामायण में प्रमुख खलनायिकाओ में से एक सुपर्णखा की जानकारी मुझे सही से कोई नही दे पाता ।क्या आप में से कोई इस बात की जानकारी रखता है की राम और रावण के युद्ध के बाद सुपर्णखा का क्या हुआ वो कहा गई उसकी शादी किस्से हुई क्या उसके कोई सन्तान हुई या नही आखिर इतनी बड़ी खलनायिका गायब कहा हो गई अगर आपमें से कोई सुपर्णखा का इतिहास जानता है तो क्रप्या बताय
    धन्यवाद
    आप मेरी इस बात को मज़ाक नही समझे मुझे सच में इस बात को जान्ने की इच्छा है की क्या हुआ सुपर्णखा का

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  38. आप सभी रामायण की सभी घटनाओं को जानते
    हैं । रामायण में सभी राक्षसों का वध हुआ
    था लेकिन सूर्पनखा का वध नहीं हुआ
    था उसका नाक और कान काट कर छोड़
    दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे
    को छुपा कर रहती थी । रावन के मर जाने के बाद
    वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास
    गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी ।
    राक्षसों का वंस ख़त्म न हो इसलिए शुक्राचार्य
    ने शिव जी की आराधना की ।शिव जी ने
    अपना स्वरुप शुक्राचार्य को दे कर
    कहा की जिस दिन कोई वैष्णव इस पर गंगा जल
    चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश
    हो जायेगा ।उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने
    वैष्णव मतलब हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित
    किया जो आज अरब में है । सूर्पनखा जो उस समय
    चेहरा ढक कर रहती थी वो परंपरा को उसके
    बच्चो ने पूरा निभाया आज भी मुस्लिम औरतें
    चेहरा ढकी रहती हैं । सूर्पनखा के वंसज आज
    मुसलमान कहलाते हैं । क्युकी शुक्राचार्य ने
    इनको जीवन दान दिया इस लिए ये शुक्रवार
    को विशेष महत्त्व देते हैं ।
    पूरी जानकारी तथ्यों पर आधारित सच हैं
    आप जानते है मक्का मे शिव लिंग है
    आज आप सभी को एक सच से अवगत करता हु । आप सभी रामायण की सभी घटनाओं को जानते हैं । रामायण में सभी राक्षसों का वध हुआ था लेकिन सूर्पनखा का वध नहीं हुआ था उसका नाक और कान काट कर छोड़ दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे को छुपा कर रहती थी । रावन के मर जाने के बाद वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी । राक्षसों का वंस ख़त्म न हो इसलिए शुक्राचार्य ने शिव जी की आराधना की ।शिव जी ने अपना स्वरुप शुक्राचार्य को दे कर कहा की जिस दिन कोई वैष्णव इस पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश हो जायेगा ।उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने वैष्णव मतलब हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया जो आज अरब में है । सूर्पनखा जो उस समय चेहरा ढक कर रहती थी वो परंपरा को उसके बच्चो ने पूरा निभाया आज भी मुस्लिम औरतें चेहरा ढकी रहती हैं । सूर्पनखा के वंसज आज मुसलमान कहलाते हैं । क्युकी शुक्राचार्य ने इनको जीवन दान दिया इस लिए ये शुक्रवार को विशेष महत्त्व देते हैं । पूरी जानकारी तथ्यों पर आधारित सच हैं आप जानते है मक्का मे शिव लिंग है

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  39. भाई मयंक, सूर्पनखा तो बिधवा थी। फिर उसका पति कहाँ से आ गया ?

    उत्तर देंहटाएं

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