इन दिनों मन काफी उद्विग्न है .और उद्विग्नता का कारण भी 'मानवीय' है . कुछ तो ब्लॉग जगत से जुडा है बाकी दीगर दुनिया के मानवी कमियों से ...वैसे तो मैं मूढ़ता की हद तक आशावादी हूँ मगर कभी कभी लगता है यह दुनिया सचमुच एक जालिम दुनिया ही है -यहाँ परले दर्जे की स्वार्थपरता है,आत्मकेंद्रिकता है ,अपने पराये की सोच है ,कृतघ्नता है ,धोखाधड़ी और छल है,अहमन्यता है ,हिंसा है ,दुःख दर्द के सिवा और कुछ नहीं है -गरज यह कि यह दुनिया रहने लायक नहीं है ..हमीं लोगों ने इसे रहने लायक नहीं छोड़ा है ..भले ही हमारा चिर उद्घोष सत्यमेव जयते का है मगर अभी इसी बैनर से चल रहे दूरदर्शन कार्यक्रम ने हमारे अपने समाज के घिनौने चेहरे की परतें उघाड़नी शुरू कर दी हैं -अब तक के केवल तीन इपीसोड़ ने ही बता दिया है कि हमरा समाज दरअसल लुच्चों कमीनों से भरा हुआ है ....गैर पढ़े लिखे नहीं, पढ़े लिखे ज्यादा खूंखार हैं ,संवेदनाओं से रहित हैं ...जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियाँ इन दिनों काफी शिद्दत से याद आ रही हैं -
प्रकृति है सुन्दर परम उदार
नर ह्रदय परमिति पूरित स्वार्थ
जहां सुख मिला न उसको तृप्ति
स्वप्न सी आशा मिली सुषुप्ति
मगर एक ऐसे समाज के सामने तो अभी अपना ब्लागजगत लाख गुना अच्छा है ..हाँ यह भी अपने समान्तर दुनिया से मिलने की राह पर ही है.
ब्लॉग जगत का भी वह पुराना सहज उत्साह ,मासूमियत भरी उछाह जाती रही...यहाँ भी अब घाघों और घुघूतों का बसेरा है (घुघूती जी माफ़ करेगीं यह उनके घुघूत के लिए नहीं है बल्कि यहाँ यह उल्लुओं की एक प्रजाति के नाम के रूप में उद्धृत है) ...अब घुघूती जी बीच में आ रही हैं नहीं तो यह शब्द अपने सार्वजनीकरण में कतिपय स्त्रीलिंगों को भी लपेटता ,उनके लिए धन्यभाग, घुघूती जी रक्षा कवच बन गयी हैं :) यहाँ भी दिन ब दिन अजीब अहमन्यता तारी होती जा रही है ..केवल अपनी गाते रहना दूसरों की न सुनना ....दिक्कत यही हुयी कि यहाँ हर कोई ब्लॉगर है यहाँ दरअसल कोई पाठक है ही नहीं ...जो पाठकीय वृत्ति रखते थे वे भी अब काम भर के ब्लॉगर हो गए हैं .....ब्लॉगर तो एक अलग कौम ही है -उसे साहित्य आदि से कुछ लेना देना भी नहीं है ....बस जबरदस्ती ब्लागरी ( बलागीरी) करते जाना है ...कोई शिष्टाचार भी उसके लिए मायने नहीं रखता क्योकि वह ब्लॉगर है -केवल अपनी पढना अपनी गुनना ...अपनी ढपली अपना राग ....
तेजी से लोग दूसरे ब्लागों को पढना बंद कर रहे हैं -काहें कि अपने सिवा दूसरे के ब्लाग पढना ब्लागीय आचार संहिता में नहीं आता ..हाँ टिप्पणियों की लालच में दूसरे ब्लागों के पढने का स्वांग भर करते हैं -अगर टिप्पणियों पर एक ठीक ठाक नज़र डाल दी जाय तो अक्सर यही दिखता है कि ब्लॉगर बिचारे ने निष्पत्ति कुछ दी है ..टिप्पणी उससे तनिक भी मेल नहीं खाती ..यही चलता रहा तो जल्दी ही टिप्पणी भाष्यकारों की मांग भी होने लगेगी ..मैं तो पहले ही रिजायिन कर रहा हूँ -खुद अपने ब्लॉग पोस्ट पर की गयी टिप्पणियाँ जब समझ नहीं पा रहा हूँ ,दीगर ब्लागरों की क्या ख़ाक मदद कर पाऊंगा?यह भी एक अजीब सी अहमन्यता है दूसरे ब्लागों को झाँकने तक नहीं जायेगें और ख्वाहिश यह रहेगी कि उनके यहाँ राग दरबारी बजती रहे ... अब कोई आप के यहाँ आया आपको पढ़ा और एवज में एक स्मारिका /टिप्पणी छोड़ गया तो आपका भी यह दायित्व बनता है कि कभी कभार ही सही वहां जाकर कृतज्ञता दिखायें -यह शिष्टाचार का तकाजा भी है . मगर यहाँ अपना विशिष्ट बोध ,अपनी दिखावटी व्यस्तता आड़े हाथ आती हैं ... मुझे यह कतई पसंद नहीं है इसलिए मैंने भी अब निर्णय लिया है कि ब्लॉग पोस्ट अगर पढने लायक रही तो पढ़ जरुर लूँगा मगर टिप्पणी तो वहीं करना है जो हमारे यहाँ भी भले ही भूले भटके आता रहे ....नहीं तो हम भी इतने दरिया दिल काहें बने .....शठे शाठ्यम समाचरेत ...यह संस्कृत उक्ति तो है ही मार्ग दिखाने को :)
उत्तर प्रदेश में नगर निकाय का चुनावी बिगुल बज चुका है ..अब अगले डेढ़ माह तक मेरे पास भी फुर्सत भरा समय नहीं है ..इसलिए नए संकल्प को अपनाने में सहूलियत ही होगी ...वैसे मेरी अपील यही है कि चाहे जो भी हो ब्लॉग लिखना आप कोई भी बंद न करें और दूसरी पोस्टों पर भी अगर आपने उन्हें पढने के बाद पाया है कि वे टिप्पणी डिजर्व करती हैं अपना पत्रं पुष्पं जरुर छोड़ आयें ....हाँ अगर वह बन्दा इतना अहमन्यता पाले बैठा है कि वह कहीं और टिप्पणी करता ही नहीं और कभी भी भूल से भी आपके यहाँ नहीं आता और आप उसके नियमित टिप्पणीकार हैं तो वक्त आ गया है उसकी अहमन्यता को बढ़ावा तो न ही दें .... वह आपके ही उदारता से और भी अहम पालता चला गया है ...अगर उसके पास वक्त नहीं है तो आपके पास वक्त कहाँ है? -हाँ ऐसे लोग अपवाद हैं जिन्होंने इन्ही बातों के मद्दे नज़र अपना दरवाजा /खिड़की/टिप्पणी खांचा बंद कर रखा है -मतलब लेने देने का व्यवहार बंद -मगर जो दोनों कपाट खोले जूकियो की तरह कांपा लगाये बैठे टिप्पणी की ओर टकटकी लगाये रहते हैं और खुद कहीं टिप्पणी नहीं करते हैं -उन्हें सबक सिखाया जाना चाहिए ... वे आपकी सदाशयता और सहिष्णुता के पात्र नहीं हैं .... जो आपको न जाने ताके बाप को न जानिए ... :)
मैं जानता हूँ मेरे कुछ मित्र भी जो इसी कटेगरी के हैं यह पढ़कर मुझ पर सठियाने का आरोप लगायेगें उनके लिए बता दूं कि ब्लॉगर पुंगव (श्रेष्ठ ) अनूप शुक्ल जी मुझे पहले ही चिर युवा की संज्ञा/विशेषण दे चुके हैं ....और अभी तो मैं पचपन का भी नहीं हुआ ...पचपन मानें बचपन ! :)



