सोमवार, 26 जनवरी 2015

तुलसी के लिए गुरु ,ब्राह्मण और दुष्ट भी वंदनीय हैं!


तुलसी मानस का आरम्भ गुरु वंदना से करते हैं। गुरु के प्रति उनके मन में अनन्य श्रद्धा और समर्पण है -वे गुरु के चरणधूल की वंदना करते हैं जो उनके लिए मकरंद के समान है -
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा 
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू
मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है!
गुरु वंदना के उपरान्त तुलसी धरती के देवताओं का वंदन करते हैं। अर्थात ब्राह्मणों का। मगर तुलसी के ब्राह्मण कौन हैं ? उन्होंने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है -
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥
पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरने वाले हैं।
अर्थात ब्राह्मण वही जो मोह से उत्पन्न सारे भ्रमों को दूर करने की क्षमता रखता हो ,न कि स्वयं मोह ग्रस्त हो. आज के अधिकाँश ब्राह्मणों की तो कुछ मत पूछिए।अपनी दुर्दशा के कारण वे स्वयं हैं। कभी समाज को दृष्टि देने वाले आज स्वयं दिग्भ्रमित हैं. और आज के तमाम अंधविश्वासों, कुप्रथाओं और अज्ञान के प्रसार के लिए मुख्यतः ब्राह्मण ही जिम्मेदार हैं। इसलिए तुलसी ने ब्राह्मणों को लेकर अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है। 

तुलसी फिर संतों की वंदना करते हैं। कहते हैं सत्संगत से बढ़कर और कुछ नहीं। और संतो की संगत अर्थात सत्संगत सारे संसारी कष्टों को दूर करने वाली है -
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला
:-सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है.
 दुष्टों की वंदना
मानस के बालकाण्ड में दुष्टों की वंदना का भी रोचक वर्णन है. दुष्टों के प्रति क्लेश रखने के बजाय उनका भी पूजन वंदन कर लेने से शुभ कार्य निर्विघ्न पूरे होगें -कदाचित तुलसी का यह भाव रहा हो या फिर यह प्रसंग मात्र एक शुद्ध परिहास भी हो सकता है। किन्तु ग्रन्थ के आरम्भ में रचनाकार का निश्चय ही निश्छल और गंभीर रहना ही अधिक संभव लगता है और उन्होंने खल वंदना भी सच्चे मन से ही किया होगा।
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें
अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है .
*तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके
-जो तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिए केतु (पुच्छल तारे) के समान है और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है.
* पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा
 जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टों को (हजार मुख वाले) शेषजी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराए दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं .
* बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा
-जिनको कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं'
* उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति -दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसी का भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है .
* मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा
-मैंने अपनी ओर से विनती की है, परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे।
कौओं को बड़े प्रेम से पालिए, परन्तु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं?
 क्रमशः

रविवार, 18 जनवरी 2015

पी के-अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर ही छोड़ आएं!

1  सितम्बर 2012 को बनारस से ट्रांसफर होकर जब से सोनभद्र आया नए स्थान की कटु कुटिल चुनौतियों से जूझते हुए और नयी परिस्थितियों में खुद को ढालते हुए समय कुछ ऐसा बीता कि मनपसंद कई बातें, कई शौक बिसरा बैठे। यहाँ तक कि कोई फिल्म भी नहीं देख पाये। अब कहाँ बनारस के माल में फिल्म देखने का एम्बिएंस और कहाँ यहाँ सोनभद्र के कस्बाई मुख्यालय  रॉबर्ट्सगंज के जजर्र सिनेमाघर! जाने की हिम्मत भी नहीं जुटी। और मुझे यह भी नहीं लगा कि वहां "इज़्ज़तदार आदमी"(!)  को देखने वाली वाली फिल्मे भी लगती होंगी। इस  बीच कितनी अच्छी अच्छी फ़िल्में आईं और चली गयीं।  मन मसोसता रहा और फिल्मों के  दीवाने अपने एक प्रिय सर को कनविंस करने का असफल प्रयास भी कि सर मैं इन कारणों से फिल्म नहीं देख पा रहा।  
मगर जब पी के की चर्चा और उस पर मचे हो हल्ले की खबर सुनायी पड़ने लगी तो संकल्प किया कि इसे देखनी है और वह भी बनारस चल के।  इसमें एक अंतरिक्ष वासी के धरती पर आने और यहाँ के हालात से जूझने के कथानक ने भी आकर्षित किया। मैं इस फिल्म को इस नज़रिये से भी देखना चाहता था कि क्या   यह साइंस फिक्शन के फ्रेम में आ सकती है?बहरहाल कल वह सुदिन आ गया और हम मियाँ बीबी फिल्म बनारस के आई पी माल में देख ही आये. 
ठीक ठाक फिल्म है। थीम धार्मिक पाखंड है।  मगर कई और भी संकेत हैं।  कहानी को बंम्बईया चाशनी में लपेटा गया है -प्रेम सीन है ,धमाका है ,विछोह है ,फैमिली ड्रामा है।  यह सब कोई नया नहीं है।  और धर्म के पाखण्ड पर कटाक्ष करने के मामले में भी यह फिल्म कोई नयी नहीं है।  बस नया है तो एक एलियन का नज़रिया।  सुदूर अंतरिक्ष से धरती पर शोध करने आया शोधार्थी असहज स्थितियों में एक सर्वथा अजनबी संस्कृति से साक्षात्कार करता है। मैं जैसे सोनभद्र आकर अपने शौक भूल गया वैसे ही बिचारे के साथ आते ही  एक ऐसी त्रासदी हुयी कि उसे अपना मकसद ही भूलना पड़ा।  उसका वह यंत्र  उससे छीन लिया गया जिससे उसे यान को वापस बुलाना था।  अब घबराहट और घर जाने की फ़िक्र में कोई शोध ठीक से भला कैसे हो पाता।  अगर एक एलियन की निगाहों से आप इस फिल्म को देखे तो आनंद आएगा -अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर के स्ट्रांग रूम  में जमा कर दें! 
ईश्वर सार्वभौम नहीं है।  केवल धरती पर है। धर्म केवल धरती पर है। संस्कृति  धरती पर है।कम से कम ये सब एलियन की धरती पर तो जैसे यहाँ हैं वैसा नहीं है।  और फिर धर्म को लेकर फैले पाखंड का जो अतार्किक  स्वरुप एक एलियन की नज़र देखती है उससे वह स्तब्ध और भ्रमित हो रहता है. मजे की बात तो यह है कि धर्म के जिस पाखंड पर फिल्म चोट करती है बिल्कुल उसी की पुनरावृत्ति इस फिल्म को लेकर मूर्खजन करते हैं और हास्य का पात्र बनते हैं। और तो और स्वामी रामदेव जी भी इस फिल्म को लेकर आक्रामक हो गए थे संभवतः बिना देखे ही।  फिल्म ने विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के पाखंड पर चोट की है और उनके अतार्किक अंतर्विरोधों को दिखाया है।  एक एलियन के साथ धरतीवासियों का इनट्रैक्शन रोचक है -उसे पियक्कड़ समझ लिया जाता है -नाम पी के पड जाता है। 
आपमे जायदातर लोगों  फिल्म अब तक देख ली होगी सो कहानी बताने की जरुरत नहीं।  धर्म की प्रासंगिकता को लेकर चुटीले और सार्थक संवाद हैं।  धर्म और पाखंड के अंतर को बताने का प्रयास है -मगर थीम कोई नयी नहीं।  ओह माई गाड़ इसी अधिक प्रभावशाली तरीके से विषय को रखती है।  इसमें कई फूहड़ कॉमेडी है जो कुछ ख़ास तरह के दर्शकों को ज्यादा भाएगी।  जैसे बच्चों और महिलाओं को और कुछ दृश्य उन्हें असहज भी करेगें। हाल की खिलखिलाहट और स्तब्धता से भी  मैंने यही समझा।  

अब यह फिल्म विज्ञान  कथा की श्रेणी में रखी जा सकती है या नहीं ? विचार विमर्श फेसबुक पर चल रहा है।  हाँ थोड़े से दृश्य और कोण  फिल्म में जरा हट के और डाल दिए गए होते तो यह शर्तिया मुख्यधारा की साइंस फिक्शन कही जा सकती थी -अभी तो थोड़ा हिचकिचाहट सी है। काश निदेशक ने मुझसे संपर्क किया होता? :-) मुझे अपनी लिखी पहली विज्ञान कथा गुरुदक्षिणा की याद ज़ीशान ने दिलाई और कहा कि फिल्म तो शुरू में आपकी कहानी सी लगती है।ना ना मैं निदेशक या फिल्म राईटर पर कोई आक्षेप नहीं लगा रहा हूँ :-) 

शनिवार, 17 जनवरी 2015

ब्लॉग पर मानस प्रभाती! वन्दे वाणी विनायकौ!



फेसबुक पर मानस प्रभाती ने सुधी मित्रों, मानस प्रेमी पाठकों को मुझसे  ब्लॉग पर भी इसे अभिलेखार्थ डालते रहने के लिए प्रेरित किया और उनके निरंतर अनुरोध पर अब मानस प्रभाती यहाँ आवधिक तौर पर उपलब्ध होगी। शुरुआत मानस के आरम्भ से ही करते हैं। 
वन्दे वाणी विनायकौ!
जी, इस वन्दना से ही तुलसी ने मानस का प्रारम्भ किया है। दरअसल लोक परम्परा में प्रथम पूजा के अधिकारी गणेश जी हैं। आप सभी ने भी कितने ही कार्य 'श्री गणेशाय नमः' के साथ शुरू किया होगा। और आज भी कोई भी मांगलिक कार्य गणेश की आराधना से ही शुरू होता है। वे विघ्न विनाशक माने गए हैं। मानस आरम्भ में भी संत तुलसी के मन में यह बात कौंधी होगी। मगर तुलसी तो तुलसी। इस सरस्वती पुत्र को माँ सरस्वती का भी प्रथम आराध्य के रूप में अपने महान ग्रन्थ के प्रणयन के आरम्भ में आह्वान करना था। सो एक युक्ति निकाली उन्होंने -वन्दे वाणी विनायकौ! मतलब दोनों का समान रूप से आह्वान कर लिया। मगर इसमें भी विद्या और बुद्धि की अधिष्टात्री को उन्होंने प्राथमिकता दी। बड़ी ख़ूबसूरती और विद्वता के साथ। अस्तु , वन्दे वाणी विनायकौ!
* वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ
अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली सरस्वतीजी और गणेशजी की मैं वंदना करता हूँ!
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आज शोध/काव्य प्रबंधों में जहाँ संदर्भिका(Bibliography) अंत में देने का प्रचलन है ,तुलसी ने पहले ही अपने अध्ययन स्रोतों का उल्लेख कर दिया है-
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति
अनेक पुराण, वेद और (तंत्र) शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में विस्तृत करता है'तुलसी ने एक बड़ी अच्छी बात कही कि मानस की रचना उन्होंने खुद अपनी संतुष्टि के लिए की है -"स्वान्तः सुखाय" -संभवतः रचना की सोद्देशता को लेकर उठने वाले विवादों से वे अपनी इस मानस -कृति को दूर रखना चाहते थे। मगर मानस को लेकर हुआ वाद वितंडा भला कौन नहीं जानता। उन्हें बनारस के संस्कृत के पंडितों, शैवों से जूझना पड़ा कालांतर में समाज के अनेक वर्गों की भी प्रखर आलोचना सहनी पड़ी -मगर मानस का महत्व कम न होकर बढ़ता ही गया है तो इसका कारण इसकी काव्यश्रेष्ठता और उद्येश्यपूर्णता ही है। जिसका उत्तरोत्तर परिचय हमें मिलेगा।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो!

जब हिन्दी ब्लॉगों का एक दशक पहले आगाज  हुआ था तो कहा गया था कि अभिव्यक्ति  के  एक युगांतरकारी माध्यम का आगमन हो गया है। अब न तो संपादकों की  कैंची  का डर था और न कही कोई रोक टोक।बेख़ौफ़ बयानी का एक चुंबकीय आमंत्रण था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर की शिक्षा लेकर युवाओं की एक फ़ौज अंतर्जाल की नयी संभावनाओं को तलाश रही थी। जाहिर है उनमें से  अधिकांश का सृजनात्मक लेखन से कोई  लेना देना नहीं था और न  कोई अनुभव ।  फिर भी उन्होंने अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन की अलख जगाई और उसमें से कुछ तो रातो रात अच्छे लेखक के रूप में सन्नाम भी हो गए। यह समय (2003 -२००७ ) हिन्दी ब्लॉग लेखन का प्रस्फुटन  काल था।

हिन्दी  ब्लॉग जगत में इसके बाद साहित्यिक और सृजनात्मक प्रतिभाओं की पैठ हुई और लगने लगा कि हिन्दी ब्लागिंग के रूप में अभिव्यक्ति का एक नया युग आ गया है जो पारम्परिक मीडिया को धता बताकर रहेगा। और हिन्दी ब्लागिंग की यह धमक और ठसक आगे के कई सालों तक बनी रही। और इस माध्यम/विधा की खिलाफत भी हिन्दी के पारम्परिक खुर्राट और खेमेबाज साहित्यकारों  /संपादको की ओर से शुरू हो गयी गई -उन्हें अचानक अपने विस्थापन  का खतरा भी दिखाई देने  लग  गया था।  मजे की बात यह कि वे ब्लॉग बैठकियों में मुख्य अतिथि की हैसियत से  बुलाये जाते और मंच पर ही इस माध्यम की खिल्ली उड़ा आते। आत्ममुग्ध ब्लागर  ऐठ में उनकी बातों को तवज्जो नहीं देते। यह  हिन्दी  ब्लॉग जगत का पुष्पन -पल्लवन काल(2007 - 2010 था। 

ठीक इसके बाद ब्लॉग जगत का वह हाहाकारी स्वर्णकाल आया जिससे प्रतिभाओं का अजस्र  बहाव यहाँ देखा गया ।  एक से एक सच्चे प्रतिभाशाली , आत्ममुग्ध और स्वनामधन्य महानुभाव अवतरित हुए जिन्हे  ब्लागजगत  के अब तक पुरायट कहे जा रहे ब्लागरों ने सीख दी , संरक्षण दिया और दुर्भाग्य से हिन्दी ब्लागजगत में भी पारम्परिक साहित्य की अनेक दुष्प्रवृत्तियों का यहीं से आरम्भ शुरू हुआ। खेमे बने ,'मठ' बने और मठाधीश बने।  जाति  बिरादरी के नाम पर गोलबंदी शुरू  हुयी। कई  मगरूर ब्लॉगर आये। कई बेशऊर भी आये।  किसी ने मखमली माहौल बनाया तो किसी ने इस्पाती ताकत दिखाई। व्यर्थ के लड़ाई झगड़े बहस मुहाबिसे और रोज की चख चख ।  सृजन गायब होने लगा -रगड़ घषड़ की ऊष्मा ही ज्यादा फ़ैली।  लोगों ने देख सुन लेने की धमकियां  भी दी लीं. 

भारत का अब तक न जाने कहाँ  सोया नारीत्व भी  अचानक जाग दहाड़ें मारने लग गया  .ब्लागरों की पुरुष महिला कैटेगरी  का क्लीवेज भी साफ ज़ाहिर हो चला।  स्वाभाविक था रचनाशील सौम्यता अब परदे के पीछे जा पहुँची थी।  हिन्दी ब्लागजगत का मोहभंग काल अब शुरू हो चला था।  कुछ का ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने मुद्रण माध्यम का दामन थाम लिया -जिसे वे कभी  पानी पी पीकर कोसते थे।  कुछ ने तो यहाँ तम्बू उखड़ने के अंदेशे से  झटपट इस माध्यम  का लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल कर प्रकाशकों से  मिल मिला पैसे वैसे दे दिलाकर किताबें छपवाईं  और बिकवानी शुरू कर दीं।  

हिन्दी ब्लागजगत का अवसान काल  अब आसन्न था। दशेक काल में सब कुछ हो हवा गया।  उत्थान पतन सब।  अभी भी लोग कहते  हैं, नहीं नहीं ब्लॉग अब भी खूब लिखे पढ़े जा रहे हैं -मगर पाठक हैं कहाँ  भाई? हिन्दी के अन्तरजालीय पाठकों को हमने संस्कारित ही तो नहीं  किया -यहाँ तो सब  ब्लॉगर लेखक ही हैं -ब्लॉग पाठकों का टोटा है -उनकी कोई जमात नहीं, जत्था नहीं। यहाँ ब्लॉगर ही लेखक है और खुद  वही पाठक भी । अलग से पाठक वर्ग गायब है।  पाठकों को ललचाये  जाए बिना हिन्दी जगत के दिन बहुरने से रहे। तब तक शायद हम ब्लॉगर अल्पसंख्यकों को हाथ पर हाथ बैठे रहना होगा।  इस माध्यम को भी अब प्रायोजकों  प्रश्रयदाताओं की ही  तलाश है -आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो ! 

 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बेटे कौस्तुभ के विवाह की अविस्मरणीय क्षणिकाएँ!

ब्लॉगर और व्यंग शिरोमणि अनूप शुक्ल जी का स्नेहादेश मिला कि मैं सद्य संपन्न बेटे कौस्तुभ के विवाह पर अपने ब्लॉग पर कुछ लिखूं। अब इतने मिले जुले अनुभव हुए हैं कि उन्हें ब्लाग पोस्ट की सीमा में समेटना बहुत मुश्किल सा है -इसलिए लिखने की शैली -लिखना कम और समझना अधिक वाली ही रहेगी। बेटे ने तीन चार माह पहले अपनी माँ से रहस्योद्घाटन किया कि उसे प्रेम विवाह करना है -प्रेम विवाह तक तो फिर भी ठीक था मगर यह तो अंतर्जातीय विवाह की बात थी। माँ घोर ब्राह्मण और वह भी "सर्वश्रेष्ठ शुक्ल" परिवार की -सुना तो दहल गईं। मुझसे भी छिपाए रखी गयी बात -मगर बात कहाँ पचती -एक सुअवसर पाकर उन्होंने मुझे बतायी -इस अचानक अप्रत्याशित इस बात से मुझे थोड़ा धक्का सा लगा तो मगर मैं सहज हो गया। 
कौस्तुभ संग वर्षा
 
 मैं पहले से ही दृढ मत का रहा हूँ कि शादी-व्याह बच्चों की इच्छा पर ही होना चाहिए। उन पर पैरेंटल दबाव नहीं होना चाहिए। दूसरा कि दहेज़ का लेंन देन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यह व्यक्ति - परिवार की गरिमा को गिराता है। अनूप शुक्ल जी ने ब्लॉग लेखन के हाहाकारी दिनों में मेरे इस विचार को ललकारा था -क्या आप खुद अपने बेटे का ऐसा विवाह करेगें? अब चूँकि अपने समाज में कथनी करनी का एक बड़ा अंतर है इसलिए शुक्ल जी का ऐसा पूछना सहज था। मैंने हामी भर दी थी । भवितव्यता साक्षात थी।  लड़की वाले बनारस के चौरसिया परिवार के हैं तो उन्हें यह बड़ी हिचक थी कि ब्राह्मणों में बड़ा लेन देन चलता है। कौस्तुभ ने बताया कि उसने और वर्षा (वधू ) ने जब वे इंटरमीडिएट में थे तभी अनुबंध किया था कि जब दोनों को नौकरी मिल जाएगी तो वे विवाह करेगें. मुझे यह अच्छा लगा कि आज के इस अधीरता के युग में ऐसा कोई पैक्ट इतने वर्षों (पूरे आठ वर्ष) बना रहा तो निश्चय ही इनके बीच समर्पण है। बाकी मैंने अपने जीवन में जाति पाति पर कभी ध्यान नहीं दिया। मेरे लिए हमेशा व्यक्ति महत्वपूर्ण रहा है। 
वर वधू और अतिथियों के स्वागत में सजा मेघदूत


मगर समाज का प्रबल विरोध मुझे सहना पड़ा। मगर मैं दृढ रहा। हाँ मैंने कौस्तुभ को सुझाव दिया कि तुम बनारस में कोर्ट मैरेज कर लो और समान मनसा इष्ट मित्रों के साथ एक रिसेप्शन हो जायेगा। मगर साहबजादे पारम्परिक विवाह पर अड़ गए -मैंने लाख समझाया कि दो नावों पर पैर न रखो मगर ये महापुरुष तो 'बेस्ट आफ बोथ द वर्ल्ड' हासिल करने पर अड़े रहे। कई रिश्तेदारों ने कड़ी लानत मलामत की -बंधु बांधवों का कड़ा विरोध भी रहा। हाँ केवल ह्यूस्टन विश्वविद्यालय अमेरिका के मेरे सगे चाचा डॉ सरोज कुमार मिश्रा जी चटटान की तरह इस विवाह के पक्ष में दृढ रहे। और विवाह में शामिल होने का वादा किया।  फिर देश का कानून भी साथ था।

 यह निमत्रण पत्र बेटी प्रियेषा ने डिजाइन किया था 
 धीरे धीरे आंतरिक विरोध के बावजूद भी बाहरी विरोध कम होने लगा। पारम्परिक विवाह का माहौल बनने लग गया। लड़की वालों की एक बड़ी आशंका मैंने यह स्पष्ट कहकर दूर कर दी कि मुझे दहेज़ नहीं चाहिए -न तो प्रत्यक्ष और न ही अप्रत्यक्ष। यह भी नहीं कि आपने अपनी बेटी के लिए कुछ तो संकल्प किया होगा। कुछ भी नहीं। बस हम सीमित और विशिष्ट जनों की बारात लेकर और वह भी दिन की बेला  में आयेगें।  इसलिए विवाह स्थल गरिमापूर्ण हो -चौरसिया परिवार ने बनारस के एक स्टार होटल रैडिसन में यह व्यवस्था की -अभी बीते १२ दिसम्बर को कौस्तुभ -वर्षा का परिणय संपन्न हुआ और वर्षा उसी दिन/रात पैतृक निवास मेघदूत आ गयी जो खुद दुल्हन की तरह सजा इस नव विवाहित जोड़े का इंतज़ार कर रहा था। विवाह में समाज के विभिन्न क्षेत्रों -राजनीति ,सिविल प्रशासन ,ग्राम्यजन, ब्लागर मित्रगण सभी जुटे। वर वधु को आशीर्वाद दिया। कौस्तुभ बंगलौर में एक फार्मास्यूटिकल उद्योग -सामी लैब्स में सहायक प्रबंधक हैं और वर्षा का चयन रिज़र्व बैंक में ग्रुप बी अधिकारी पद पर हुआ है।

मेघदूत पर आशीर्वाद प्रीतिभोज का आयोजन अगले दिन १३ दिसम्बर को था। जहाँ माहौल सहज था -कहीं कुछ भी असहज नहीं था। जो मित्र आये उनका तो आशीर्वाद कौस्तुभ -वर्षा को मिल गया। अब आपकी बारी है।
A photo gallery link: Courtesy Santosh Trivedi! 

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

प्रेम पत्रों का विसर्जन!

 प्रौद्योगिकी की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति ने मनुष्य के निजी और सामाजिक कार्यव्यवहार पर काफी प्रभाव  डाला है और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है।  आज एक मित्र से इस पहलू पर काफी रोचक विचार विमर्श हुआ और उन्ही के अनुरोध पर यह नई ब्लॉग पोस्ट लिखी भी जा रही है।  जी हाँ मनुष्य के जीवन के एक निजी अहम पहलू पर भी प्रौद्योगिकी ने गहरा  असर डाला है और वह है प्रेम. एक समय था जब हर  घर में न तो लैंडलाइन फोन थे और  मोबाइल का  तो दूर दूर तक कोई अता  पता ही न था। और तब प्रेमी प्रेमिका के बीच खतोकिताबत का ही एक सहारा था जिससे इज़हारे मुहब्बत और इश्क़ का सिलसिला चलता था। और वह था सुन्दर सुलेख खतों का आदान प्रदान जिसके जरिये ही मुहब्बत  परवान चढ़ती थी । मेरे मित्र  ने तफ्सील से ज़िक्र किया कि कैसे सुन्दर सुन्दर रंगीन कागजों और लिफाफों का जुगाड़ होता था और लगभग रोज ही एक प्रेम पत्र मेल बाक्स के हवाले हो  जाता था या फिर माशूक /माशूका के घर की दूरी ज्यादा न हुयी तो दीगर  सन्देश वाहकों का इंतज़ाम किया जाता था।
मेरे मित्र का  किस्सा भी बहुत कुछ मेरे जैसा ही है कि जिनसे ख़तो  किताबत हुयी वे कोई और नहीं नव परिणीता पत्नी ही थीं  और उन्हें तो साधिकार प्रेम पत्र लिखने का  सामजिक लाइसेंस मिल गया था। बेशर्मी भी अगर रही हो तो उसकी पूरी स्वीकार्यता थी।  एक पूरा प्रणयकाल(कोर्टशिप पीरियड )  ही इन प्रेम पत्रों के आदान प्रदान में बीत जाता था और तब कहीं जाकर एकाध साल बाद गौना (पति पत्नी का मिलन -सेकेण्ड सेरेमनी ) होता था तब तक उभय हृदयों का  अपरिचय पूरी तरह से मिट चुका होता था। मिलन बस एक औपचारिकता भर रह जाती थी -प्रेम पत्रों  में ह्रदय उड़ेल  दिया जाता था -कस्मे वादे होते थे -जन्म जन्मांतर तक साथ रहने की कसमें खाईं जाती थीं -एक दूसरे के प्रति समर्पण अपने उत्कर्ष पर जा पहुंचता था।

 मित्र ने अपने अतीत को याद करते हुए मुझे भी कितनी ही भूली बिसरी यादें ताजा करा दीं।  यह भी कहा कि  घर घर फोन और मोबाइल हो जाने से बिचारी नयी पढ़ी का यह सुख उनसे छिन गया है - यह कहते हुए उनके चेहरे पर जो भाव था वह ठीक से पढ़ा नहीं जा  सका कि वे नयी पीढ़ी के प्रति वास्तव में अफ़सोस कर रहे थे या फिर उन पर कटाक्ष कर रहे थे. हाँ अपने समय की प्रेम प्रधानता की गौरवानुभूति उनके चेहरे पर स्पष्ट थी। जो मजा कागज़ के प्रेम पत्रों  के लिखने पढने में है भला मोबाइल नेट संस्कृति में  कहाँ? लिखती  हूँ खत खून से स्याही न समझना मरती हूँ तुम्हारे याद में जिन्दा न समझना को पढ़ने का अहसास एक अलौकिकता का बोध कराता था।  उफ़ बीत गए वो रूमानी दिन ..  

बहरहाल मित्रों के बीच का यह अतीत -संवाद एक जगहं आकर ठहर गया -
मित्र ने कहा कि वे प्रेम पत्र तो आज  भी पड़े हुए हैं बहुत ही संभाल कर और सुरक्षित -क्या  किया जाय उनका? ऐसे तो कूड़े में फेंका नहीं जा सकता।  उनका तो एक डीसेंट डिस्पोजल होना चाहिए।  एक सम्मानपूर्ण विसर्जन।  तभी उन्हें याद आया कि मैं तो ब्लॉग लिखता हूँ तो यह समस्या तनिक ब्लॉग पर डाल दूँ -यह बहुत संभव है कि समान वयी  दूसरे मित्रों का भी यही धर्म संकट हो या फिर उनके सामने इसका कोई सम्मानजनक हल हो।  मैंने तो उन्हें सुझा दिया है कि चलिए संगम क्षेत्रे  एक सामूहिक प्रेम पत्र विसर्जन कार्यक्रम ही आयोजित कर लिया जाय और पवित्र संगम की अपार जलराशि में  प्रेम की  इस धरोहर को अर्पित कर दिया जाय।  आपके पास भी अगर कोई और  उदात्त विचार हों तो मित्र की मदद सकते हैं।  

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

भाग दरिद्दर भाग-दीवाली संस्मरण!

दीवाली की अनेक यादें हैं। इस बार अपने पैतृक निवास जा नहीं पाया तो यादें और भी सघन हो मन में उमड़ घुमड़ रही हैं। हमारे लिए दीवाली का मतलब ही होता था पटाखों और फुलझड़ियों का प्रदर्शन। एक माह पहले से ही छुरछुरी ( पूर्वांचल में फुलझड़ियों को इस नाम से भी पुकारते हैं ) इकट्ठी करना शुरू हो जाता था जिसमें किशोरावस्था की देहरी पर खड़े समवयी हम कुछ बच्चे बड़े बुजुर्गो से आँख बचा बचा कर एक गोपनीय संग्रह करते जाते थे. कुछ जेब खर्च और निश्चय ही कुछ चुराया हुआ धन इसमें इस्तेमाल होता था. पिता जी नयी सोच के थे तो पर्यावरण की चिंता उनको रहती थी और वे आखों के सामने पड़ते ही हमें पर्यावरण पर पूरा पाठ पढ़ा देते और पटाखों के धुर विरोधी थे। हाँ बाबा जी हमारे बीच बचाव को आते थे और पिता जी को समझाते कि एक दिन में पर्यांवरण नष्ट नहीं हो जाएगा और बच्चे इतनी छुरछुरी भी कहाँ छोड़ते हैं? 

बहरहाल इसी माहौल और तनातनी के बीच हम अपने संग्रह कार्य में जुटे रहते थे। और चर्खियों, गैस , टेलीफोन, स्वर्गबान ,अनार, लाईट बम , सुतली बम के नामों से मिलने वाले अद्भुत आइटमों की खरीद होती रहती -एक पुराना परित्यक्त थोड़ा टूटा सा बक्सा हमें मिल गया था उसी में यह खजाना संचित होता रहता। यह बक्सा एक साथी के पुराने घर के कोठिला (अन्न संग्रह पात्र ) वाले अँधेरे कमरे में सुरक्षित रखा जाता। मुझे खुद के ऐसे तीन वाकये याद हैं जिसमें मैं पटाखों से घायल हुआ हूँ।बाल्यावस्था ,किशोरावस्था और युवावस्था तीनों काल के हादसे की कटु स्मृतियाँ हैं। युवावस्था वाली तो अति उत्साह आत्मविश्वास के चलते हुई.महा मूर्खता कि हाथ में पटाखा जलाकर उसे झट से दूर फेंक देना -मगर यह तो 'तेज आवाजा" बम था न -जैसे ही पलीते में आग लगी मैंने दूर झटका मगर यह क्या हुआ -तत्क्षण तेज धमाका और आँखों के आगे अँधेरा। बम हाथ में ही फट चुका था -हथेली जख्मी हो गयी थी जो कई दिनों रुलाती रही।

लिहाजा हाथ में लेकर कोई भी पटाखा/बम फिर से न छुड़ाने का कसम खाया गया। बाकी की दो दुर्घटनाएं बाल अन्वेषी प्रकृति की देन ही थीं जिसमें विभिन्न पटाखो के मिश्रण से एक नयी फुलझड़ी बनायी जा रही थी -मगर उस बड़े हादसे में हम बालगण बाल बाल बचे थे मगर मेरी हथेली के जख्म चिन्ह आज भी उस त्रासदी की स्मृति शेष है।

एक और स्मृति कौंध आई है। मेरे यहाँ दीपावली के दिन इस त्यौहार को न मनाकर एकादशी के दिन मनाया जाता था। ठीक दिवाली के ही दिन कोई बुजर्ग कोई पचास एक वर्ष पहले चल बसे थे. सो यह दिन अशुभ हो गया था। मैं बहुत व्यग्र रहता। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम लोग भी यानी पूरा पुरवा त्यौहार के समय ही इसे मनाये? जब और लोग दीपावली मनाते और फुलझड़ियाँ छुड़ाते तो हम लोग मायूस से हो रहते। मैं, बाबा जी और दूसरे बड़े बुजुर्गों से पूछता कि ऐसा कौन सा उपाय है कि हम भी ठीक इसी दिन त्यौहार मनायें? कहा जाता है कि अगर ठीक इसी दिन गाय को बछड़े का जन्म हो जाए या कोई लड़का जन्म ले ले तो बात बन सकती है.

 मगर मुझे ऐसी किसी घटना के इंतज़ार में वर्षों  बीत गए -अब क्योंकर कोई ऐसा सुयोग बने। एक गाय बियाई भी तो एक दिन बाद। मैंने थोड़ा लाबीइंग की मगर लोग राजी नहीं हुए। अब तक मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय आ चुका था। मैं बहुत अधीर होता कि काश दीवाली के दिन ही हमारी भी दिवाली होती -वर्ष 1980 के आस पास मैंने बाबा जी से कोई दूसरा उपाय पूछा। बड़े बुजुर्गों की पंचायत बुलाई गयी। तय पाया गया कि अगर ठीक दीपावली के दिन  घर का कोई बुजुर्ग मथुरा जाकर युमना जी में दीपदान कर दे तो बात बन सकती है। मैंने यह बात मानकर बाबा जी, माता जी और पड़ोस के और दो बुजुर्ग परिवारों की यात्रा का भार अपने ऊपर लिया . मथुरा जाकर यमुना जी में दीपदान कराया । लौटते वक्त ताजमहल को देखकर अलौकिकता का अहसास लेकर घर वापस आये. और अगले वर्ष दीवाली समय से मनाई जाने लगी।

मगर एक अड़चन तो रह ही गयी। दीवाली की एक पारम्परिक मान्यता के अनुसार दीपोत्सव के ठीक दूसरे दिन अल्ल्सुबह घरों से महिलायें सूप पीटती हुयी दरिद्र निस्तारण करती थीं ताकि मुए दलिद्दर कहीं कोने अतरे दुबके न रह जायँ। यह कार्यक्रम एकादशी की रात के बाद ही मनाया जाता रहा जबकि दीवाली उस दिन से पहले नियत समय को ही मनाई जाने लगी थी। अब बूढ़ी बुजुर्ग औरतों को कौन समझाये? मैं लाख समझाऊँ कि यह अनुष्ठान दीपावली की रात का ही है मगर वे माने तब न । एक बार मैंने फिर यह बीड़ा उठाया और नयी बहुओं को कनविंस करने लगा। मेरा भी विवाह अब तक हो गया था तो पत्नी को भी इस मुहिम में लगाया -सासू माओं से परेशान एक नयी बहू फ़ौज ने मानो अपनी भड़ास का एक रास्ता निकाल लिया था। इस बार की दीवाली के पटाखों की आवाज अभी भी फिजां में गूँज ही रही थी कि ब्रह्म मुहूर्त में सूपों पर हथेलियों की थप थप की आवाजें आनी  शुरू हो गयीं थीं।

दरिद्र निष्कासन शुरू हो चुका था। भाग दरिद्दर भाग की समवेत आवाजें भी कानों से टकरा रहीं थीं। आज संतोष त्रिवेदी ने जब यह बताया कि उनके यहाँ यह रस्म अभी भी एकादशी के दिन ही होता है तो  उन्हें मैंने  यह संस्मरण सुना दिया और उन्हें उकसाया भी कि  दीपावली के इतने दिन बाद तक भी घरों में दरिद्र बैठाये रहने का क्या मतलब है आखिर ? देखिये वे क्या कर पाते हैं! मैंने तो अपनी एक सामाजिक जिम्मेदारी निभा ली ! :-)

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

आप शर्मिंदा तो नहीं कि कैलाश सत्यार्थी को नहीं जानते?

 फेसबुक पर कई आत्ममुग्ध बुद्ध प्रबुद्ध लोगों ने उपहासात्मक लहजे में टिप्पणियाँ की हैं कि
उन्होंने कैलाश सत्यार्थी का नाम तक नहीं सुना -जैसे उनका यह उद्घोष हो कि अगर बन्दे को मैं नहीं जानता तो फिर उसकी  कोई काबिलियत ही नहीं है . प्रकारांतर से वे नोबेल की उनकी वैधता पर उंगली उठा रहे हैं। जानता तो मैं भी नहीं था उन्हें कल तक, किन्तु इसलिए शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ -उन कारणों के विवेचन में लगा हूँ कि ऐसे शख्स को जिसने भारत ही नहीं दुनिया के सैकड़ों देशों में बाल शोषण के विरुद्ध अलख जगायी और इस दिशा में ठोस काम किया, क्यों इतना अनजाना सा रह गया अपने ही देश में। सबसे पहले तो मैं अपना ही दोष मानता हूँ कि मेरी जागरूकता की कमी रही -मैं अपने संकीर्ण दायरों से बाहर न निकल सका या फिर इनके कार्यों को महज एक आम सामाजिक कार्यकर्त्ता द्वारा किये जा रहे कार्यों के रूप में ले लिया-यह नाम दिमाग में जगह नहीं बना सका।

मगर मैं अन्य कारणों को भी समझना चाहता हूँ जिससे यह शख्स इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद भी अनजाना रहा? क्या अपने देश की मीडिया की भूमिका कटघरे में है? या देश के शासक वर्ग की अनदेखी? या फिर कोई और कारण ? फिर कैलाश सत्यार्थी का कार्य सचमुच इतना उल्लेखनीय नहीं रहा और महज वैश्विक राजनीतिक कारणों से यह पुरस्कार महानुभाव की झोली में टपक पड़ा है? कल से दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा है! हमारे देश में नेता और अभिनेता के  सिवा सेलिब्रिटी होना किसी अपवाद से कम नहीं है। विदेशी संस्थानों को हमारे यहाँ के दूसरे तीसरे दरजे के क़ाबिल लोगों जैसे वैज्ञानिकों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं की  भले ही सुधि हो आए। 

एक और बात है अब मीडिया और शासकीय वर्ग भी सत्यार्थी के विरुदावली गायन में जुट गया है मगर यह सदाशयता उन दिनों कहाँ थी जब इन्हे इसकी बहुत जरुरत रही होगी? भारत में यह पुरानी बात है कि जब तक हमारा कोई अपना पश्चिम से सम्मानित और अनुशंसित नहीं होता हम उसे तवज्जो नहीं देते? परमुखापेक्षता का यह विद्रूप उदाहरण है।इस  देश को अपनी प्रतिभाओं की न तो पहचान है और न ही कद्र। बेकदरी से जूझते अकुलाये वैज्ञानिक  और दीगर प्रतिभायें  विदेश का  रुख करती हैं। यहाँ प्रतिभाओं पर जंग लगती जाती है।  यहां प्रतिभा पलायन साथ प्रतिभाओं के जंग खाते जाने की विकराल समस्या रही है। 

अब लोगों में आत्मगौरव का जज्बा चढ़ रहा है कि वाह देखो भारत को और एक नोबेल मिल गया -मित्रों, यह सम्मान केवल और केवल सत्यार्थी का है -यह उनकी अतिशय उदारता है जो उन्होंने भारतीयों को इसका उत्तराधिकारी कहा है। सच तो यह है कि भारत का राजनीति और लालफीताशाही से दूषित परिवेश और हमारा चिर आत्मकेंद्रित समाज ऐसे पुरस्कारों की कूवत नहीं रखता -हाँ उसका श्रेय लेने को हम बढ़ चढ़ के दौड़ पड़ते हैं ! बेशर्मी की  हद तक। 

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल!

अभी कल ही नए ब्लॉग संग्राहक ब्लॉग सेतु के संचालक केवल राम जी ने अपने फेसबुक वाल पर मेरे ब्लॉग क्वचिदन्यतोपि का हेडर लगा कर मित्रों से इस नाम पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी। अभी कोई प्रतिक्रिया आयी भी न थी कि सहसा मैंने उसे देख लिया और थोड़ा असहज हो गया। क्योकि एक तो यह शब्द लोगों की जुबान पर सहजता से चढ़ता नहीं है दूसरे अब यह पुराने ज़माने का ब्लॉग हो गया -लोग याद भी काहें रखें। मुझे केवल राम जी की सदाशयता पर किंचित भी संदेह नहीं है फिर मुझे यह भी डर लगा कि कहीं कोई टिप्पणी न आने से मेरी बेइज्जती न खराब हो जाय -लोग कहें कि ई लो देखो बड़े बनते हैं बड़का ब्लॉगर और आज कोई पूछने वाला भी नहीं है -अब हम लाख कहते कि भाई मैं कोई गुजरा वक्त भी नहीं जो आ न सकूँ मगर कोई काहें को मानता। कई मित्रगण तो आज भी गाहे बगाहे मेरी खिंचाई पर ही लगे रहते हैं। अब लोगों को मौका न मिले यही सोचकर मैंने जल्दी से वहां एक झेंपी हुयी टिप्पणी चिपका ही तो दी। अब यह पोस्ट टिप्पणी विहीन तो नहीं रहेगी। शर्मनाक स्थिति से कुछ तो राहत मिलेगी।

बहरहाल कुछ समय बाद ही वहां ब्लॉग शिरोमणि अनूप शुक्ल जी का आगमन हो गया और उन्होंने मेरे सम्मान की कुछ रक्षा कर दी -क्वचिदन्यतोपि के अर्थादि को लेकर मेरे ब्लॉग पोस्ट वहां लगाए -यह अनूप जी की विशिष्ट विशेषता है -ब्लॉग के आदि(म) पुरुषों में से हैं वें और ब्लॉग साहित्य की कालजीविता के लिए प्राणपण से जुटे रहते हैं -दोस्त दुश्मन में कोई भेद किये बिना। और महानुभाव ब्लॉगों के चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया भी हैं अलग। वे इस माध्यम/विधा को आगे ले चलने को सदैव तत्पर रहते हैं। मुझे आश्चर्य है कि उनके इस महनीय योगदान के बाद भी देश के नामी गिरामी पुरस्कार देऊ संस्थायें उन तक क्यों नहीं पहुँच रहीं। अब तो मुझे लगता है अनूप जी को खुद एक बड़का पुरस्कार घोषित कर देना चाहिए -कम से कम बीस पच्चीस हजार का -इतना वेतन तो पाते हैं वे अब कोई लाख सवा लाख रूपये मासिक तो जरूर ही. ऐसे और कई महानुभाव हैं नाम नहीं ले सकता क्योकि उनसे इतनी स्वच्छंदता नहीं ले सकता जितनी अनूप जी से मगर आह्वान है कि वे भी आगे आएं और एक फंड स्थापित किया जाय जो अच्छे युवा ब्लागरों को पुरस्कृत कर सके। मैं भी अकिंचन योगदान दे सकता हूँ। अपने सतीश सक्सेना जी भी इस पुनीत कार्य में पीछे न रहगें!

अब वक्त यही है कि पहली पीढ़ी के ब्लॉगर आएं और इस माध्यम/विधा को प्रोत्साहित करने को अपनी टेंट ढीली करें ताकि ब्लागिंग का टेंट फिर मजबूती से गड जाए। मैं उन मन को बहलाने वाले विचारों से कतई सहमत नहीं हूँ कि आज भी ब्लागिंग की रौनक कायम है, ब्ला ब्ला ब्ला। अब समय है हम अपना आर्थिक योगदान भी सुनिश्चित करें अन्यथा हिन्दी ब्लागिंग पर उमड़ते संकट को देखा जा सकता है। मुद्रण माध्यम में छपास का मोह और फेसबुक इसे ले डूबने वाला है। तो ब्लागिंग के अग्रदूतों का आह्वान है कि वे इस संकट की बेला में कोई ठोस आर्थिक प्रस्ताव लेकर आएं और हम सब मिल बैठ कर उसे कार्यान्वित करें -एक ख़ास ब्लॉग बैठकी इस काज के लिए भी आहूत की जा सकती है। आप सभी के विचार आमंत्रित हैं -खुदगर्जी से तनिक आगे बढ़ें और ब्लॉग बहुजन हिताय कोई ठोस काम करें!

अंतर्जाल ने हमें मौका दिया अपने परिचय के वितान को विस्तारित करने का -आज हम चंद वर्षों में ही कितने परिचय समृद्ध हो चुके हैं। चिर ऋणी हैं अंतर्जाल के जिसने कितने ही सुदूर क्षेत्र और रुचियों के लोगों को एक साथ ही ला खड़ा नहीं किया, आजीवन प्रगाढ़ संबंधों की नींव भी रख दी। हाँ इस मौके पर कुछ मित्र मुझे शिद्दत से याद आ रहे हैं जो अंतर्जाल से छिटक कर दुनिया की भीड़ में खो गए हैं -मगर कोई बात नहीं -कोई तो मजबूरी रही होगी वार्ना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। हाँ अगर उन तक भी यह बात संदेशवाहकों या समकालीन नारदों के जरिये पहुंचे तो उनका भी स्वागत है अगर वे जुड़ना चाहें इस मुहिम में! अज्ञात रहकर भी लोग यथायोगय गुप्तदान कर सकते हैं।

केवल राम जी, आप से बस इतना ही कहना कि आप की युक्ति कामयाब रही। गांडीव उठवा दिया आपने और अनूप जी आपको भी शुक्रिया कि क्वचिदन्यतोपि के बंद करने की (मिथ्या ) घोषणा करके आपने मुझे प्रतिवाद करने को उकसा दिया। मगर मेरे प्रस्ताव पर ध्यान जरूर दीजिये और मित्रगण भी अपने विचार यहाँ प्रगट करें और कुछ दान दक्षिणा दे सकते हों तो सलज्ज /निर्लज्ज होकर कहें भी -क्योकि यह हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल है।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

एक अदद उद्धव की तलाश है!

कभी कभी सोचता हूँ कृष्ण को आखिर उद्धव की जरुरत ही क्यों पडी होगी ? गोपियों से अपने गोपन संबंधों को किसी और से साझा करना? और इसकी इतनी जरुरत भी क्या थी द्वारिकाधीश को? फिर उद्धव की जरुरत इसलिए भी नहीं समझ आती कि वे तो खुद लीला पुरुष थे और इसलिए हर पल हर वक्त सर्वगामी सर्वव्याप्त भी। वे अपनी योगमाया से द्वारिका और मथुरा -वृन्दावन एक साथ ही रह लेते। उनके लिए यह कहाँ असंभव था? अब अध्यात्मवादी यहाँ यही जवाब देगें कि यह तो उनकी 'लीला' भर थी. सचमुच यह लीला ही रही होगी और वे गोपियों और राधा के प्रति थोड़ा नैतिक आग्रह भी रखते रहे होगें -यह कृष्ण का एक उज्ज्वल पक्ष लगता है। और इसलिए अपने एक अति विश्वस्त सखा को उन्होंने संदेशवाहक बना कर भेजा।

अब आज के विरही प्रेमियों जैसी आशंका उन्हें थोड़े ही रही होगी कि उद्धव कहीं अपनी ही दाल न गलाने लग जायं । उद्धव ने प्रयास भी किया हो तो कृष्ण -प्रेमिकाओं ने एकदम से इस संभावना को निर्मूल कर दिया और कहा की हे उधो मन दस या बीस नहीं होते -हताश निराश उधो की इसके बाद की कथा का कोई खास इतिहास नहीं मिलता। पता नहीं वे लौट कर कृष्ण के पास गए भी या नहीं। गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य समर्पण का यह एक प्रमाण है। मगर कृष्ण का प्रेम? छलिया कृष्ण?

मगर एक नैतिकता तो थी ही उनमें -कुछ तो खुद को जवाबदेह समझा गोपियों का -सोचा होगा बिचारियां वियोग में तड़प रही होगीं। तो खुद क्या जाना अब, किसी संदेशवाहक को ही भेज दो. बस इतनी नैतिकता से काम चल जायेगा। भोले लोगों को और क्या चाहिए? उन्हें मनाना कित्ता तो आसान होता है। उन्हें यह भी फ़िक्र थोड़े ही थी कहीं उद्धव अपना किस्सा चलाये तो चलायें मेरी बला से। और फिर इतना घणा सखा तो रहा है मेरा आखिर प्रेम रस -रास से यह भी इतना अछूता क्यों रहे बिचारा। इधर बिचारा उधर कितनी ही बिचारियां-कोई चक्कर वक्कर चल भी जाय तो थोड़ा इसका भी कल्याण हो जायेगा। तो कृष्ण की एक नैतिकता अपने सखा के प्रति भी रही होगी।

मुझे लगता है कृष्ण और गोपियाँ हर देश काल में रही हैं। मगर कोई उद्धव नहीं दिखता। लव जिहाद का युग है। सब कुछ खुद करने कराने का ज़माना है नहीं तो बात बिगड़ सकती है। मुझे लगा कि उद्धव की खोज होनी चाहिए। किसी कोने अतरे में हो सकता है सिमटा दुबका मिल ही जाय। मैंने अपने मित्रों में से तलाशा। एक ने तो तत्काल इस उद्धव वालंटियरशिप का ऑफर स्वीकार कर लिया। उसने अतीव उतावलेपन से तुरंत पूछा जाना कहाँ और किसके पास होगा?

मगर उसकी तत्परता ने मुझे उसके सख्यपन को लेकर गंभीर आशंका में डाल दिया -नहीं नहीं यह मेरा उद्धव नहीं हो सकता। मुझे पुरुष मित्रों में से कोई उपयुक्त नहीं लगा उद्धव बनने के लिए। एक मित्राणी ब्लॉगर ने वालंटियर बनने का आग्रह किया। मगर यहाँ भी खतरा है -गोपियाँ और राधा तो जल भुन जायेगीं -क्या क्या न कह डालें मेरी मित्र को -कलमुंही वगैरह वगैरह जैसी अनुचित बातें -अपने कुनबे में तो ठीक मगर किसी बाहरी को तो वे रकाबा ही समझ जाएगीं-नहीं नहीं यह तो जले पर नमक जैसा हो सकता है। फिर वे तो जन्म से ही संशयवादी हैं -ह्रदय हमेशा आशंकाओं से धड़कता रहता है छलिया कृष्ण को लेकर। तो यह महिला मित्र का ऑफर भी जाँच नहीं रहा?

एक विश्वसनीय और उपयुक्त उद्धव की तलाश है जो गोपियों को असहज न करे -मेरी कोई मदद कर सकते हैं आप ?

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