मंगलवार, 24 जून 2014

तुम वो तो नहीं!

तुम वो नहीं
तसव्वुर में थी बसी एक तस्वीर जो
मुद्दत से  था जिसका ख़याल
था सदियों से इंतज़ार जिसका
तुम वो नहीं

पास तुम आये जो
लगा सच हुआ ख्वाब मेरा
मगर जल्द ही टूटे भरम
तुम वो नहीं

शुक्र है उन
नजदीकियों का
होती गयी हर हकीकत  बयां
तुम वो नहीं

तिश्नगी फिर से वही अब
इंतज़ार फिर उस प्यार का
ताकि हो ताबीर उस ख्वाब का
तुम वो तो नहीं!

रविवार, 15 जून 2014

क्या पुरुष को बस यही चाहिए?


एक ही धरती एक ही कालावधि मगर लोगों की सोच और रुचियाँ अलग अलग देशों में कितनी भिन्न हैं और हैरत में डालने वाली हैं . क्या सही है और क्या गलत यह भी पूरी तरह सापेक्षिक है . आज फेसबुक दोस्त शालिनी श्रीवास्तव ने एक लिंक साझा किया . यह मामला है एक पश्चिमी दुनिया में पली बढ़ी युवती का जिन्हे सेक्स की लत  है और वे इसकी खुले आम जिक्र भी करती हैं -पब्लिक डोमेन में उन्होंने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है. और अपने सेक्स अभिरुचियों और झुकावों का ईमानदारी से जिक्र भी किया है. इस लेख की चर्चा अन्यत्र जगहों पर इसकी बेबाकी और ईमानदार स्वीकृतियों के चलते है। आप को पूरा आलेख पढ़ने के लिए ऊपर के  अंग्रेजी लिंक पर जाना होगा मगर मैं हिन्दी प्रेमियों के लिए यहाँ कुछ उद्धरण देना चाहता हूँ.

क्रिस्टीन व्हेलेन  ४० वर्ष की मोटी महिला हैं। एक रिलेशन में थीं जो दस वर्षों चला मगर टूट गया। अब उन्हें सेक्स की सनक सवार हो गयी - अपने सर्किल के किसी मित्र, जान पहचान वाले  के साथ सोने को तैयार। और यह सिलसिला चल पड़ा. उन्होंने अपने अनुभवों को समेट कर यह प्रकाश डाला है कि आखिर पुरुष चाहते क्या हैं? और इससे भी बढ़कर कि उनकी खुद की क्या ख्वाहिश होती  है . उनके सेक्स संबंधियों में कई आयु वर्ग के लोग हैं. टीनएजर्स भी . उनकी स्वीकारोक्ति को कुछ आलोचकों ने वर्ष २०१४ का एक बड़ा खुलासा माना है.

मोहतरमा क्रिस्टीन व्हेलेन ने खुद के बारे में बताया है कि वे बहुत इंटेलिजेंट हैं ,मनोविनोदी हैं ,कभी कभार स्टाइलिश ,अपने बारे में बेफिक्र और वास्तव में बहुत अच्छी हैं। वे कहती हैं कि आकर्षण एक निजी मामला है और उनमें वह बहुत कुछ नहीं है जो बहुतों के लिए उन्हें आकर्षक बनाए। उनकी अपनी सेक्स अभिरुचियाँ /वितृष्णायें हैं और इसलिए और लोगों के समान व्यवहार से भी उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता ।क्रिस्टीन ने अपने एक दीवाने से पूछा कि उसे एक थुलथुल चालीस वर्षीय महिला में आखिर क्या आकर्षक लगा? जवाब था क्रिस्टीन तुम्हारा जबर्दस्त आत्मविश्वास ! कांफिडेंस इज सेक्सी! 

मैंने यह क्रिस्टीन कथा एक सनसनी पोस्ट के लिए ही नहीं की है . यह भारतीय समाज के सेक्स वर्जना को  सापेक्ष रखने और उस पर खुली चर्चा के लिए पोस्ट किया है मैंने . बहुत से लोग तुरंत क्रिस्टीन को वैश्या कह देगें -काल गर्ल कहेगें! मगर उसके निर्भीक आत्मकथन, स्पष्टवादिता को तवज्जो नहीं देगें .हमारा कल्चर इतनी स्वच्छंदता को अनुमति नहीं देता बल्कि सेक्स को पाप की सीमा तक यहाँ घृणित समझा जाता है -एक उचित स्थिति कहीं बीच में है . है ना ?

मंगलवार, 10 जून 2014

क्यूँ होता है ऐसा? (कविता)

क्यूँ होता है ऐसा?

क्यूँ होता है ऐसा  कि पराये अपने हो जाते हैं और अपने पराये
कि चुक जाती  है प्रीति अनायास ही किसी मीत की और
अलगाते हैं रिश्ते  अकारण ही  बिना बात के
विस्मृत  हो जाते  हैं वे सभी  वादे
किये गए थे जो  कभी भावों के आगोश में 
क्यूँ होता है 
ऐसा कि  अनायास ही कोई मिलता है  और लगता है
जैसे हो उससे  जन्म जन्मान्तर का कोई रिश्ता
मगर  वह भी  बिखर जाता है बिना परवान चढ़े 
यह अल्पकालिक जीवन भी कैसे कैसे  श्वेत श्याम
और इंद्रधनुषी सपने दिखाता  है
 एक दिन सहसा ये सारे सपने बेआवाज टूटते हैं -
सहसा  आ धमकता है आख़िरी दिन का फरमान
ऐसा क्यूँ होता है?

गुरुवार, 29 मई 2014

एक ब्लागर की चिट्ठी प्रधानमंत्री जी के नाम - क्या अब सचमुच शुद्ध हो पाएंगी गंगा?

 प्रधान मंत्री जी गंगा के शुद्धिकरण को लेकर आप कटिबद्ध हैं। मगर तनिक रुकिए - गंगा शुद्ध हो यह कोटि कोटि जनों की मांग है।  गंगा संस्कृति प्रसूता है और  जनभावनाओं से गहरी जुडी हैं।  कहा गया है कि गंगा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है -गंगा तव दर्शनात् मुक्तिः! और अब तो गंगा हमारी राष्ट्रीय नदी भी हैं।  मगर गंगा शुद्ध और निर्मल रहें यह एक बड़ी चुनौती हैं -हाँ उनकी पवित्रता को लेकर आस्थावानों में कोई संदेह नहीं, भले ही आज की गंगा में डुबकी लगाने से परम श्रद्धावान तक भी हिचक जाते हैं।  किसी भी पर्यावरणविद से पूछिए वह आंकड़े देकर बता देगा कि गंगा में प्रदूषण के तमाम मापदंड और संकेतक अब इसे विश्व की अनेक प्रदूषित नदियों की सूची में  ला रखते हैं और अब यह कोई विवादित मुद्दा भी नहीं है।  मगर मुद्दा यह जरूर है कि अब इसे अपनी स्वाभाविक दशा में कैसे लाया जाय। यह कतई एक आसान मुहिम  नहीं है।  

जानकारी मिली है कि  गंगा को लेकर अपनी वचनवद्धता के चलते इस महायोजना पर आपके आदेश से धनराशि का आबंटन शुरू भी हो गया है।  मगर तनिक रुकिए प्रधानमंत्री जी! आपसे भी वही भूलें न हो जायँ जो पहले की सरकारें करती आयी हैं।  गंगा शुद्धिकरण के नए अभियान पर धनराशि मुक्त करने के पहले यह सुनिश्चित करना होगा   कि इस महा अभियान की नईं कार्य योजना क्या है और उसके विभिन्न चरण और उनके समापन की समयावधियां क्या होगीं? गंगा की सफाई एक बहुल रणनीतिक /गतिविधि प्रक्रिया है। बड़े बांधों से गंगा का अविरल प्रवाह कैसे मुक्त होगा ? किनारे के औद्योगिक कचरों का प्रवाह कैसे रुकेगा ? शहरों के मलजल के  निपटान की वैकल्पिक कारगर युक्ति क्या होगी ? नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना को कब अमली जामा पहनाया जाएगा ? गंगा और सहायक नदियों में समय के साथ जो गाद इकठ्ठा होती आयी है उसे कैसे निकाला जाएगा? नदियों के तल काफी उथले हो चले हैं।  उनकी जलधारण क्षमता  कम  होती गयी है।  खनिज निस्तारण की गलत नीतियों के चलते कई जगहों पर रेत/बालू के ढूहे  उठे हुए हैं जिनका निरंतर विवेकपूर्ण निस्तारण भी होना चाहिए।  बनारस  शहर के गंगा के उस पार के तट पर पिछले कई वर्षों से कछुआ अभयारण्य की दुहायी देकर रेत की सफाई न होने देने से जल दबाव शहर के घाटों की और बह  रहा है . किसी दिन यह शहर में भारी तबाही का कारण बन सकता है।  

बनारस की गंगा की दशा कम  शोचनीय नहीं है।यहाँ स्नान ध्यान के लिए श्रद्धालुओं का भारी ताँता रोज ही लगा रहता है मगर शहर का मलजल कई जगहों पर सीधे नदी में ही गिरता है।  एक तो राजघाट के करीब सरायमुहाना गांव के पास ही वरुणा संगम के नजदीक ही गिरता रहता है -देखकर ही जुगुप्सा उत्पन्न होती है। बिना मलजल निस्तारण के ठोस और भरोसेमंद विकल्प के गंगा कैसे निर्मल होंगी? गंगा की सफाई का जुमला आसान है मगर क्रियान्वयन के लिए फिर से एक भगीरथ प्रयास की जरुरत है।  कानपुर के औद्योगिक कचरे को गंगा में गिराये जाने से रोके बिना हम इस नदी के शुद्धिकरण का जाप कैसे कर सकते हैं?कितने ही प्रयास तो हुए मगर औद्योगिक घराने कोई न कोई बचने का तरीका निकाल लेते हैं और उन्हें तंत्र को संतुष्ट करते रहने की कला भी आती है।  हमने छोटे बांधों के बजाय दैत्याकार बांधों के निर्माण की नीति बनायी।  यह भी एक प्रमुख कारण है कि गंगा का अविरल प्रवाह बाधित हुआ।  अब हम कैसे इन बड़े बाँधों से गंगा के प्रवाह को मुक्त करेगें।  गंगा से बढ़कर तो शोचनीय दशा सहायक नदियों की है -यमुना ,गोमती और सई नदियां अपने अस्तित्व की आख़िरी जंग लड़ रही हैं।  गंगा शुद्धिकरण की कोई एकल प्रयास नीति तब तक सफल नहीं है जब तक उसकी सहायक नदियों को लेकर एक समेकित योजना को मूर्त रूप न दिया जाय।  

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी जी ने नदियों को जोड़ने की एक महत्वाकांक्षी  परियोजना सुझायी थी , उस पर कार्य ठप है.  कुछ अतिवादी पर्यावरण विरोधी इसका मुखर विरोध करते रहे हैं।  वर्तमान सरकार की मंत्री मेनका गांधी जी भी इसके पक्ष में नहीं रही हैं।  मेरी अल्प समझ में अब भारत की नदियों के उद्धार के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय नहीं है -पर्यावरण  असंतुलन का हो हल्ला मात्र एक मिथक है कोई सच नहीं।  विश्व में अनेक भौगोलिक बदलाव खुद कुदरत कर देती है मगर कालांतर में सब कुछ सहज हो लेता है , भारतीय नदियों को जोड़ देने से ऐसा कोई पर्यावरणीय कोहराम नहीं मचने वाला है -बल्कि कई प्रजातियों को और भी व्यापक क्षेत्र विकसित होने को मिल सकता है जो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं।  गंगा की सूंस डॉल्फ़िन जो हमारे  जलतंत्र का राष्ट्रीय जीव है उसे अन्य नदियों में विस्थापन की कार्य योजना क्यों तैयार नहीं हो सकती?   
प्रधानमंत्री जी!  ये सारे मुद्दे गंगा के निर्मलीकरण के लिए महत्वपूर्ण और अपरिहार्य हैं  ! पहले इन बिन्दुओं पर एक तूफानी ब्रेन स्टॉर्मिंग करके एक निश्चित कार्ययोेजना तैयार करना ज्यादा जरूरी लग रहा है।   अन्यथा इस नयी मुहिम पर निर्गत बजट को भ्रष्ट इंजीनियर ,नेता - ब्यूरोक्रैट नेक्सस तथा छुटभैये नेता डकार जायेगें और फिर केवल नाकामी हाथ लगेगी! और इस सरकार के रिपोर्ट कार्ड में गंगा के शुद्धिकरण का उल्लेख तो करना ही होगा!

रविवार, 25 मई 2014

हिन्दी ब्लागिंग के अच्छे दिन आने वाले हैं!


हिन्दी ब्लॉगों की निरंतर बढ़ती वीरानी से सभी मायूस होते जा रहे हैं।  क्या सचमुच हिन्दी ब्लागिंग इतिहास में सिमट गया? जबकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि हिन्दी ब्लॉग्स का तो अभी इतिहास शुरू ही नहीं हुआ था।  बहरहाल मैं भी इसी उधेड़बुन में था और पिछले कुछ समय से से खुद भी यहाँ से अनुपस्थित था।  ऐसे ही जब फेसबुक पर अपनी चिंता दर्ज की तो केवल राम जी ने एक नए ब्लॉग संकलक  का नाम बता दिया -ब्लॉग सेतु और मुझसे इससे जुड़ने का अनुरोध किया।  मुझे रजिस्ट्रेशन में कुछ असुविधा हुई तो खुद फोन कर समस्या का निराकरण किया।  मेरे तीन ब्लॉग यहाँ अब जुड़ चुके हैं। 

मैंने केवल राम से पूछा कि भाई आप करते क्या हैं? उन्होंने जवाब दिया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिन्दी ब्लागिंग में शोध कर रहे हैं।  तब समझ में आया कि इस विधा को लेकर वे इतना गंभीर क्यों हैं।  वे अभी युवा हैं और सुदर्शन व्यक्तित्व के  हैं ,मृदु भाषी भी हैं -पुरुषों में ये सभी गुण  प्रत्यक्षतः एक साथ कम  ही दिखते हैं - वे हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध स्थल धर्मशाला के निवासी हैं।  जहाँ तक मुझे याद है वे हिन्दी ब्लॉग जगत में एक  समय से सक्रिय हैं।  और उनके प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए।  यह केवल उनका कंसर्न नहीं बल्कि हमारा सबका साझा कंसर्न है कि हिन्दी ब्लागिंग की बगिया में फिर से बहार आये और हमें एक बार फिर से फील गुड करा सके! 

ऐसा भी नहीं कि यहाँ नयी कोपलें न फूट  रही हों मगर एक अच्छे एग्रीगेटर के अभाव में हमें उनका पता नहीं लग पाता है  -बस वही कुछ खोज खबर ले पाते होंगे जो गहरे पानी पैठते होगें. हम सरीखों के लिए जिनके लिए राज काज नाना जंजाला है कोई ऐसा माध्यम चाहिए जो झट से ब्लॉग जगत की नयी प्रविष्टियों का एक झरोखा दिखा सके।  ब्लॉग सेतु से उम्मीद है की वह  इस जरुरत को पूरा करेगा।  केवल राम का यह भी कहना है कि कोई भी ब्लॉग जो वहां पंजीकृत हो गया है अगर कोई नयी पोस्ट प्रकाशित करता है तो ब्लॉग सेतु पर तुरंत दिखने भी लगेगा।  जैसे एक जमाने में ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत में होता था। 

 केवल राम 
आईए ब्लागसेतु से जुड़ कर इसका स्वागत करें।  हिन्दी ब्लागिंग के अच्छे दिन आने वाले हैं !

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

सधवा की साध!

विगत फरवरी माह से लोकसभा निर्वाचन की तैयारियों में ऐसा मुब्तिला होना पड़ा कि ब्लागिंग स्लागिंग सब छूटा।  बस कभी कभार फेसबुक पर आना जाना रहा।  किसी ब्लॉगर के ब्लॉग पर भी चाह कर जा नहीं पाया , सज्जन ब्लागर माफ़ करेगें और मेरी मजबूरी समझेगें। मगर कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं कि वे खुद को अभिव्यक्त करा लेने की कूवत रखते हैं जैसा कि आज का मुद्दा है।  कल पत्नी ने घर पर काम करने वाली दाई का एक ऐसा वृत्तांत सुनाया कि वह मन पर गहरे अंकित हो गया।  वही आपसे साझा करना है।

दाई का पति बहुत बीमार है और उसकी सेवा में वह दिन रात जुटी रहती है।   दाई अपना यह दुखड़ा पत्नी को सुनाती ही रहती है। उसकी भी उम्र काफी हो चुकी है।   कल उसने बहुत भावुक होकर कहा कि वे मेरे सामने ही चले जायँ मैं तो भगवान से यही मनाती हूँ नहीं तो मेरे पहले चल बसने पर उनकी कौन देखभाल करेगा? बात मेरे कानों तक पहुँची और मैं विस्मित सा हुआ।  क्योकि अक्सर हम यही सुनते हैं कि महिलायें पति से पहले ही जाने की इच्छा रखती हैं।  मतलब वे वैधव्य नहीं चाहतीं।  पति के सामने ही वे अपनी सदगति चाहती हैं।  मगर यह सोच कि जीवन साथी की देखरेख कौन करेगा मेरी दृष्टि में एक उदात्त सोच है जो रिश्ते के समर्पण को दर्शाता है।  मतलब वैधव्य का बोझ भी स्वीकार है मगर जीवन साथी की देखभाल में कोई कोताही न हो. 

मैंने इस बात का जिक्र कल फेसबुक पर किया था तो विविध विचार  आये हैं।  जिनमें एक यह भी है कि पुरुष प्रधान समाज में पति के दिवंगत होने पर पत्नी को एक बड़ी पारिवारिक और सामाजिक उपेक्षा का भी शिकार होना पड़ता है।  आर्थिक पहलू अलग है। एक दींन शीर्ण और उपेक्षित जीवन से तो मृत्यु ही भली है।  और यही सोच ज्यादातर भारतीय महिलाओं में एक सांस्कृतिक कलेवर ले चुकी है जिनमें वे सधवा ही मृत्यु का वरण करने को इच्छुक हो रहती हैं।  वे वैधव्य की नारकीय स्थिति का  सामना नहीं करना चाहतीं।

यह तो एक जीवन साथी की सोच हुयी -पत्नियों की सोच हुयी।  पति क्या सोचते हैं इस विषय पर इसकी चर्चा फिर कभी हम फुरसत में करेगें इन दिनों तो सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है :-(

आप अपने विचार जरूर दीजियेगा -प्रतीक्षा रहेगी!

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

अथातो गुरुघंटाल जिज्ञासा......

एक दिन फेसबुक पर मैंने यह जुमला  क्या छेड़ा  कि गुरु तो गुरु ही होता है(आदि आदि ) तो इस पर काफी चर्चा हो गयी. संतोष  त्रिवेदी ने पलट वार किया की मगर चेला चेला ही नहीं रह सकता वह गुरु भी हो सकता है - अली सईद साहब इसी उत्तर की ही बाट जोह रहे थे -इस अपडेट पर लपक ही तो पड़े।  कहा, देखा न चेला पलटी  मार गया।  काफी चर्चा हुयी, गुजिश्ता टाईम के ब्लॉगर मित्र जिन्होंने अपने ब्लॉग की सुध बिसरा दी है  वहाँ आ जुटे और अपना अपना दर्शन झाड़ा और हमारा ज्ञान वर्धन किया। हमने भी ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है कि तर्ज पर सबकी फेसबुकीय टिप्पणियां झेलीं। 

मजे की बात यह हुयी कि इसी मुद्दे पर उस रात मैंने एक सपना देखा।  देखा कि उसमें अपने जमाने के कई धुरंधर ब्लॉगर्स एक ब्लॉगर मीट कर रहे हैं।  विषय था गुरुओं में गुरु और उनमें भी गुरु घंटाल की पहचान । विषय प्रवर्तन मैंने किया था।  मैंने कहा कि भारत के गुरुओं की महान परम्परा में ही आधुनिक गुरुओं की एक श्रेणी गुरु घटालों की होती है। और सम्भवतः बिगड़े शिष्य ही आगे चलकर गुरु घंटाल बन जाते हैं।  यहाँ भी अली भाई ने तुरंत  प्रतिक्रिया व्यक्त की -प्रत्यक्षं किम प्रमाणं।  मैंने उन्हें इशारे से आगे कुछ भी कहने से रोका।  संतोष त्रिवेदी भला कहाँ अपने को रोक पाने वाले थे -उन्होंने कहा कि मेरे निगाह में तो बस एक ही गुरु घंटाल है जो इन दिनों पहले की तुलना में कुछ कम सक्रिय है मगर अभी भी गुरु घंटाल नंबर वन है, अब ब्लॉगर लोगों की जिज्ञासा यह थी कि आखिर यह गुरु घंटाल होता क्या है  और यह किस तरह अन्य गुरुओं से अलग होता है।  सतीश सक्सेना जी ने कहा कि मुद्दा अहम है और इस पर वे जल्दी ही वे कुछ अपने गीत के माध्यम से लिखेगें। 

अपने समुदाय की अकेली नुमायन्दगी कर रही वाणी गीत शर्मा जी ने एक मासूमियत भरा सवाल पूछा कि क्या महिलाओं में भी गुरु घंटाल होती हैं? तभी किसी ओर  से आवाज आयी कि उन्हें तो गुरु घंटालिने कहना चाहिए। मगर आदरणीय दिनेश द्विवेदी जी ने कहा कि ये शब्द लिंग निरपेक्ष होते हैं अतः महिला वकील को वकीलाइन कहना जैसे गलत है वैसे घंटाल को घण्टालिन कहना गलत है।  इस पर कुछ आपत्तियां और आयीं और यह पक्ष प्रस्तुत किया गया कि वकील की पत्नी को वकीलाइन कहने का चलन समाज में तो है।  बहरहाल फिर से बात गुरु घंटाल पर आकर रुक गयी। किसी ने सहजता से पूछा गुरु घंटाल के लक्षण क्या क्या हैं।  अभी तक अनूप शुक्ल जी काफी चुप से बैठे थे।  उन्होंने कहा कि परसाई जी ने इस पर काफी लिखा है मगर अभी तो उन्हें याद नहीं, हाँ देखकर ही वे बता पायेगें।  तब तक एक कोने से गिरिजेश राव जी और बेचैन आत्मा गलबहियां डाले दिखे।  गिरिजेश राव ने कहा कि व्युत्पत्ति शास्त्र के मुताबिक़ गुरु घंटाल का कोई न कोई संबंध घंटे से होना चाहिए।  उनका आशय मंदिर में बजने वाले घंटे से था।  अब तक शिल्पा मेहता जी भी दिखाई दे गयीं थी, इससे वाणी गीत जी के चेहरे पर एक तसल्ली का भाव उभरा।  शिल्पा मेहता जी ने गिरिजेश जी की बात का अनुमोदन करते हुए कहा हाँ गुरु घंटाल शब्द में कुछ पण्डे और घंटे का भाव समाहित लगता है।  

तभी डॉ तारीफ़ दराल साहब और जनाब  महफूज अली भी मुझे साथ साथ बैठे दिखाई दे गए  . उन्होंने कहा कि जो भी महफूज जी का विचार होगा वही उनका भी मंतव्य समझा जाय। महफूज ने कहा कि दोनों लिंगों के गुरु घंटालों से उनका पाला तो कई बार पड़ा है मगर वे जो कुछ भी इस मुद्दे पर कहना चाहते हैं अंगरेजी में ही कहेगें। इस पर विवाद हो गया कि हिंदी ब्लागरों के बीच आंग्ल भाषा का क्या काम? महफूज जी ने चुप्पी साधना ही उचित समझा।  मुझे और कई ब्लागरों के चेहरे दिखाई पड़  रहे थे मगर वे सभी चुप चाप  इस बहस का बस श्रवण  लाभ कर रहे थे।  प्रवीण त्रयी को भी मैंने देखा और समीरलाल जी को भी मगर उनकी चुप्पी माहौल को असहज बनाये हुयी थी।  आचानक एक बड़ा शोर  सा होता लगा और मैंने देखा कि श्रीमती जी साक्षात सामने आग्नेय नेत्रों से मुझे घूर रही हैं -कब तक सोते रहेगें आज ,आफिस नहीं जाना क्या ? स्वप्न टूट गया था मगर मेरे जेहन में यही सवाल बार बार उमड़ घुमड़ रहा था कि गुरु घंटाल आखिर किसे कहते हैं और उसके लक्षण क्या क्या हैं और वह कैसे अन्य गुरुओं से अलग है? अब आप लोग ही मेरी यह जिज्ञासा दूर करिये न।  

द्वावा  त्याग : कृपया नए पुराने, भूतपूर्व और अभूतपूर्व ब्लॉगर इस स्वप्न चर्चा को अन्यथा न लें।  यह बस एक निर्मल हास्य है जिसका अभाव इन दिनों ब्लागिंग और जीवन में भी बहुत कम हो गया है। तथापि अगर कोई बंधु बांधवी अपना नाम यहाँ से हटाने को कहेगें तो ऐसा सहर्ष कर दिया जायेग!

रविवार, 19 जनवरी 2014

आपने राम चरित मानस का यह प्रसंग कभी पढ़ा-देखा है? अवश्य देखिये देखन जोगू!

विगत कई वर्षों से शीतकालीन मानस पारायण के नियमित क्रम में कल राम वनगमन का एक रोचक प्रसंग था जिसे आप सभी से साझा करने का मन हो आया। मैंने अपनी यह इच्छा फेसबुक पर जाहिर की तो अभय तिवारी जी ने तुरन्त अवगत कराया कि इसी प्रसंग पर वे भी लिख चुके हैं.यद्यपि अभय तिवारी जी ने  अयोध्या में राम की जन्मस्थली होने के दावों के विशेष संदर्भ में वह पोस्ट लिखी थी। मैं यहाँ किसी परिप्रेक्ष्य विशेष में पूरे राम वाल्मीकि संवाद को न रखकर बस तुलसीदास  कृत राम चरित मानस में राम के  वनगमन के दौरान मुनि वाल्मीकि से राम के मिलन और उनके बीच संवाद का उल्लेख करना चाहता हूँ !प्रभु राम निरंतर बिना रुके  अयोध्या से चलते आ रहे हैं। और अब वे यमुना को भी पारकर मुनिवर वाल्मीकि के आश्रम तक पहुँच गए हैं-" देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।" अब उन्हें  वन  में रुकने का कोई अस्थायी ठाँव चाहिए। मगर ठाँव भी ऐसा हो जहाँ मुनिगण ,तपस्वी और ब्राह्मण दुखों से मुक्त हों -मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू(क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है). 

 वे  सहज ही वाल्मीकि से कह  बैठते हैं- "अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।। तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।" हे मुनिवर मुझे वह  जगह बताईये जहाँ मैं कुछ समय सीता और लक्ष्मण के साथ रह सकूं। अब वाल्मीकि के लिए एक बड़ा असमंजस  था कि जो स्वयं सर्वव्यापी हैं उन्हें रहने की कौन सी जगह  बतायी जाय - उन्होंने अपना असमंजस कुछ इस तरह व्यक्त किया -
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ
(आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिए। तब मैं आपके रहने के लिए स्थान दिखाऊँ॥)

 यह पूरा संवाद ही बहुत रोचक और हृदयस्पर्शी बन उठा है. मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि  के जरिये तदनन्तर जो भी स्थान प्रभु राम के निवास के लिए बताये गए हैं वे तुलसीदास कृत राम चरित मानस के कई श्रेष्ठ रूपकों में से एक है -कुछ वास स्थान का आप भी अवलोकन  कर लीजिये -
  काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
( जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए)
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे
( जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है,जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं) 

मुझे आश्चर्य होता है कि लोग तुलसी कृत राम चरित मानस पर तरह तरह के आरोप  लगाते हैं -वर्ण व्यवस्था के पक्ष में तुलसी की कथित स्थापनाओं को उद्धृत करते हैं।  मगर तनिक मानस की यह दृष्टि भी देखिये  -राम को इन जगहों पर भी वास  करने की सिफारिश है- 
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥
( जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में रहिए॥) 
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु
( जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है) 

यह एक लम्बा संवाद है, मैंने कुछ चयनित अंश आपके सामने रखा है -विस्तृत संवाद का आंनद आप वेब दुनिया के श्री राम-वाल्मीकि संवाद पर जाकर उठा सकते हैं।  ये तो रहे प्रभु के रहने के स्थायी निवास स्थलों का वर्णन -फिलहाल अस्थायी तौर पर प्रभु कहाँ रहे इसके लिए मुनिवर ने सुझाया -"चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥" (आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है।) मुनि के सुझाये स्थल चित्रकूट पर्वत पर ही कुछ समय तक राम ने अपने वनवास का समय बिताया! ……जय श्रीराम! 

रविवार, 12 जनवरी 2014

एअरगन से मछलियों का शिकार (सेवाकाल संस्मरण - 18 )

वर्ष 1989, झांसी से चलने का वक्त आ गया था।यहाँ की पोस्टिंग ने मुझे सरकारी सेवा के कई प्रैक्टिकल अनुभव कराये।  एक तरह से आगामी सेवाकाल की पूर्व पीठिका तैयार हुई । कई अप्रिय  अनुभवों से भी गुजरना पड़ा. उन दिनों एक मंत्री जी थे श्री सीताराम निषाद जी जिनके पास सिचाई और मत्स्य दोनों का प्रभार था।  उनका आगमन हुआ।  मेरे सीनियर अधिकारी ने मुझसे मंत्री जी के आगमन पर उनके स्थानीय सद्भाव के लिए मुस्तैद रहने को कहा।  यह जानकारी भी  कि मंत्री जी के आगमन के बाद उन के खान पान का सारा इंतज़ाम हमें ही उठाना होगा -और केवल उन्ही के ही नहीं बल्कि उनके आगमन पर उनके और पार्टी के समर्थकों की भीड़ को भी चायपान और खाना भी खिलाना होगा। मगर इसके लिए विभाग का कोई बजट  अलाट होता नहीं।  मैंने अपने उच्चाधिकारी से पूछा कैसे होगा सब इंतज़ाम? उन्होंने कहा "ईंट इज नन आफ माय बिजिनेस" मैं अवाक! इतना वेतन भी नहीं था  कि खुद खर्चे उठा सकूं -कोई घर आये तो भले ही अतिथि है चाय पानी करा  दिया जाय पर पूरे अमले जामे को और वह भी सरकारी दौरे पर  खर्च खुद के द्वारा? मैं असहज हो उठा था।

मैंने सिचाई विभाग के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा मंत्री जी के खान पान पर आये खर्च को तो वे  कर लेगें मगर मुझे बाद में आधी राशि देनी होगी! मैंने स्थानीय मंत्री जी के समर्थकों में से  जिनसे अच्छा  संवाद था अपनी समस्या बतायी मगर उन्होंने कहा यह तो दस्तूर है।  बहरहाल मंत्री जी के आने के बाद यह समस्या उन  तक पहुँच गयी और उन्होंने सारा इंतज़ाम केवल सिचाई विभाग पर थोप दिया। मगर यह सब आज भी चल ही रहा है और विभागों से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे ईमानदार बने रहें -यह बात तय है कि भ्रष्टाचार की कर्मनाशा (मैं गंगोत्री नहीं कहूंगा) भी ऊपर से ही प्रवाहित होती है! खासतौर पर राजनेता और भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ व्यवस्था को बदलने नहीं देता। कहते हैं न बेशर्मी का दूसरा नाम ही राजनीति है!

 मछली का एक और अप्रिय प्रसंग है जिसका अनुभव  झांसी से ही हुआ। लोग बाग़ पशुपालन विभाग से मुर्गा  खाने की फरमाईश नहीं करते मगर मछली वाला अधिकारी लोगों की रोज रोज मछली खाने की मांग से तंग हो रहता है। अब मुश्किल यह होती है कि कस्मै देवाय हविषा विधेम! मतलब किस किस को मछली दी जाय? शायद चीन जो मत्स्य क्रान्ति में भी सदियों से अग्रणी रहा है में भी यही समस्या रही है, सो वहाँ एक कहावत ही प्रचलित हो गयी है -" किसी को मछली खाने को दो तो वह अल्प  समय के लिए ही उसका लाभ उठा लेगा मगर किसी को मछली पालना सिखा दो तो वह जीवन भर उसका लाभ  उठायेगा!" मगर यह कहावत उत्तर परदेश में लागू ही नहीं हो सकती जहाँ अकर्मण्यता, मुफतखोरी  और निर्लज्जता  की एक संस्कृति सी बन गयी है! यहाँ अपनी जेब से खर्च करने की नीयत ही नहीं है! चाहे वो अच्छा ख़ासा कमाने वाले प्रशासनिक अधिकारी हो या आम ख़ास पड़ोसी!यही नहीं उच्चाधिकारियों की मीन मुफतखोरी का आलम यह रहता है कि मछली पहुचने के दूसरे  दिन की सुबह तक जी में धुकधुकी बनी रहती है कि सब कुछ ठीक ठाक निपट गया -मछली की कोई शिकायत नहीं आयी ! आला साहबों को डिसेंट्री डायरिया तो नहीं हुआ! कोई कांटा तो नहीं गले में फंस गया।  आदि आदि दुश्चिंताएं मन में उठती रहती हैं।  

 मैं  इस मत्स्यभोज  प्रसंग से क्षुब्ध रहता आया हूँ  ! झांसी मंडल के एक सबसे आला आफिसर के यहाँ एक बार भेजी गयी मछली ही बदल गयी।कुहराम मच गया। मेरे विभाग के बड़े अफसर तक की पेशी हो गयी। बंगले से हिदायत आयी थी एक ख़ास मछली की -गोईंजी जो साँप  सी दिखती है (मास्टासेम्बलस प्रजाति) -कुक ने समझा कि ये वाली तो मैडम खाएगीं नहीं सो उसे तो अपने घर भिजवा दिया और साथ भेजी गयी दूसरी मछली का पकवान बना परोस दिया।  खाने की मेज पर ही हंगामा मच गया।हम सब तलब हो गए।  बाद में स्थति साफ़ हुयी तो खानसामे पर नजला गिर गया. मैं हमेशा इन प्रकरणों से संतप्त होता आया हूँ! एक तो कहीं से मांग जांच कर मछली का इंतज़ाम करिये और फिर साहबों के नाज नखरे झेलिये। 

एक और भी ऐसा ही मत्स्य प्रकरण है जिसमें आला अधिकारी का फरमान हुआ कि उनके बंगले के स्वीमिंग पूल में ही बड़ी बड़ी किसिम किसिम की मछलियां डाल दी जायं। जिससे उनकी जब भी इच्छा हो वे खुद वहीं से मछली निकाल लिया करें। आदेश का अनुपालन किया गया-जीप के ट्रेलर में भर भर कर उसी तरह मछलियां लायी गयीं जैसा कि मानस में वर्णन है कि भरत की आगवानी में निषादराज की आज्ञा से "मीन पीन पाठीन पुराने भर भर कान्ह कहारन लाने!" मगर ये सभी तो जिन्दा थी और अच्छे वजन और प्रजातियों की थीं! हाँ यह दीगर बात है कि परिवहन के दौरान बहुत सी मछलियां काल के गाल में समा गयीं।  कुछ दूसरे दिन से तरण  ताल में मर मर कर उतराने लगीं -बावजूद इसके सौ के ऊपर मछलियां बच ही गयीं। मगर हैरत की बात यह कि हर रोज उनमें से अधिकृत रूप से तो साहब बहादुर द्वारा एक दो ही निकाली जातीं मगर उससे ज्यादा गायब पायी जातीं।  क्या कोई चोरी कर रहा था ? साहब बहादुर के कम्पाउंड में किसकी जुर्रत कि वह चोरी करे। 

आखिर एक विभाग का चौकीदार रखवाली पर लगा दिया गया।  और तब मछलियों के कम होने का राज भी खुल गया।  होता यह कि साहब बहादुर के दुलारे किशोरवयी  प्रिंस अल्सुबह एक एअरगन लेकर निकलते और मछलियों पर निशाना साधते -एअरगन से चिड़ियों का शिकार तो देखा था मगर मछलियों के आखेट का यह पहला वाकया दरपेश हुआ था।  बहरहाल एक स्टाफ को इस घटना से साहब बहादुर को बताने के लिए तैयार किया गया और इसका अप्रत्याशित रूप से परिणाम बहुत अच्छा रहा -साहब बहादुर मछलियों पर दयार्द्र हो उठे और मछलियों की आगामी ढुलाई रोक दी गयी!

सर्विस में आगे भी ऐसे अनेक अप्रिय मत्स्य प्रसंग आते रहे हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहेगी!  जारी। .... 

रविवार, 5 जनवरी 2014

सबते सेवक धर्म कठोरा। (सेवा संस्मरण -17)

झांसी की यादों की एक खिड़की अब पूरी तरह खुल गयी लगती है। यह मेरा एक बड़ा सौभाग्य था कि मुझे यहाँ बहुत अच्छे सीनियर अधिकारी और सहधर्मी मित्र मिले जिनके साथ ने मेरे पूरे जीवन पर एक चिरस्थायी छाप छोड़ा है।  दो मित्रों का साथ और बात व्यवहार  आज भी  बना हुआ है -एक तो आर एन चतुर्वेदी जी जो इस समय चंदौली जनपद में जिला आपूर्ति अधिकारी हैं और दूसरे ऐ के श्रीवास्तवा जी जो खड़गपुर से आई आई टी पोस्ट ग्रेजुएशन करके प्रादेशिक सेवा में वैकल्पिक ऊर्जा विभाग में आ फंसे और इस समय मुख्यालय लखनऊ में पदस्थ हैं।  अगर ईमानदारी,  सज्जनता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति देखनी हो तो ऐ के श्रीवास्तवा जी से मिलना चाहिए। भाई आर एन चतुर्वेदी तो मित्रों के मित्र हैं -उनके कहकहों में सारी म्लानता सारा क्लेश मिट जाता है।  इन दोनों शख्सियतों से अक्सर बात होती है और ऐसा संवाद जुड़ता है जैसे हम जन्म जन्म के साथी हों। 

 उन्ही दिनों हमारे इमीडियेट सीनियर अधिकारी/ऐ डी  एम, पी सी एस सेवा के श्री कृष्णकांत शुक्ल जी थे जो मेरी सेवा के पहले सबसे ईमानदारी पी सी ऐस अधिकारी थे - सादगी और मनुष्यता के एक उदाहरण। मेरे झासी से आते समय श्रीमती शुक्ल जी ने हमें रास्ते का आहार- पाथेय दिया और यह हम आज भी नहीं भूले हैं। उनके बेटे हारित शुक्ल उन दिनों बैडमिंटन खिलाड़ी के रूप में उभर रहे थे मगर बड़ी  कृषकाया  थी उनकी।मुझे भी लगता कि एक खिलाड़ी के रूप में उनका विकास उनके साथ ज्यादती थी। हारित को मैं बायलोजी के कुछ पाठ पढ़ाता था और इसके लिए वे खुद मेरे सेलेस्टियल रांडिवू यानी आफिसर्स होस्टल के तीसरे तल  तक आते थे। मुझे उनके यहाँ जाना नहीं होता था।  आज हारित गुजरात  में आई ऐ एस हैं! 

इन्ही हारित को एक बार एक बी डी ओ साहब ने एक चाकलेट क्या थमा दिया था कि कृष्णकांत सर जी की नाराजगी झेलनी पडी थी और ईमानदारी की सीख भी।  उनके घर का अनुशासन कठोर था।  कृष्णकांत सर जी मेरा सम्मान करते थे जबकि मैं उनका मातहत था -एक बार मुझे अपने पैतृक गाँव ले गए थे।  उन्हें उन दिनों रविवार को टी वी पर आने वाले महाभारत सीरियल का बड़ा शौक था। हम  भी उन्ही के यहाँ यह सीरियल देखने बिना नागा पहुँच लेते थे।  एक दिन सीरियल शुरू ही हुआ था कि डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट का  बुलावा आ पहुंचा - बड़ा धर्म संकट उत्पन्न हो गया।  डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ठहरे दक्षिण भारतीय और सम्भवतः महाभारत से कम प्रभावित -बहरहाल शुक्ल सर जी ने महाभारत को वरीयता दी थी और डी एम  साहब का मनोमालिन्य झेलना स्वीकार किया था।  आज भी मैं इस निर्णय पर नहीं पहुँच पाया हूँ कि कृष्णकांत सर का   निर्णय सही था या नहीं! कारण कि सबते सेवक धर्म कठोरा। 

 पता नहीं यह परम्परा आज भी है या नहीं मगर उन दिनों जिला परिषद् द्वारा एक बड़ा सालाना उत्सव -विकास प्रदर्शनी और मेला का  आयोजन का होता था जिसमें अखिल भारतीय कवि  सम्मलेन भी सम्मिलित था।  मुझे यानि  पहली बार जिला प्रशासन के किसी अधिकारी को कवि सम्मेलन के समन्वय/संयोजन   का जिम्मा दे दिया गया -यह मेरे जीवन का एक अनिर्वचनीय और अविस्मरणीय यादगार पल था।  स्थानीय पुरायट कवियों ने इसका विरोध किया था मगर मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और इसके आयोजन में इतना श्रम किया जितना आज तक फिर कभी किसी कार्य में नहीं किया हूँ। 

 कवि  सम्मलेन जिसका नामकरण मैंने बासंती काव्य निशा  रख रखा था अभूतपूर्व रहा और इसके चलते मैं भारत के कई महान कवियों का स्नेह सानिध्य भी पा सका जो आज भी मेरे मानस पर अंकित है। श्री उर्मिलेश शंखधार ने कवि सम्मलेन का संचालन किया था  और कविवर सोम ठाकुर ने उसमें अपनी जादुई आवाज और रस सिक्त काव्य पाठ से चार चाँद लगाया था।  कैलाश गौतम जी का प्रवाहपूर्ण काव्यपाठ मैंने पहली बार उसी समय सुना था। अन्य एक से एक कविगण आये थे जो मेरी मधुर स्मृतियों को  आज भी झंकृत करते रहते हैं। 

क्या दिन थे वे, जीवन को सार्थकता प्रदान करने वाले! जारी …

 

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